Indian Railways: क्या आपने देखा है ट्रैक के पत्थर? जानिए इनके पीछे की असली वजह

Indian Railways: आपने ट्रेन में सफर तो जरूर किया होगा, लेकिन क्या कभी पटरियों के बीच बिछे छोटे-छोटे पत्थरों पर ध्यान दिया है? ये पत्थर सिर्फ दिखने के लिए नहीं होते, बल्कि ट्रैक के आसपास भी लगाए जाते हैं। इनके पीछे एक खास वैज्ञानिक कारण छिपा है, जो रेलवे ट्रैक को सुरक्षित और मजबूत बनाए रखता है

अपडेटेड Apr 12, 2026 पर 8:51 AM
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Indian Railways: गर्मी में पटरियां फैलती हैं और सर्दी में सिकुड़ती हैं।

अगर आपने कभी रेलवे ट्रैक को गौर से देखा होगा, तो पटरियों के बीच और नीचे फैले छोटे-छोटे पत्थर जरूर आपकी नजर में आए होंगे। पहली नजर में ये सामान्य पत्थर लग सकते हैं, लेकिन असल में ये रेलवे ट्रैक की मजबूती और सुरक्षा का बेहद जरूरी हिस्सा होते हैं। इन पत्थरों को “बलास्ट” कहा जाता है, जो ट्रैक को स्थिर रखने और उसे लंबे समय तक टिकाऊ बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

रेलवे ट्रैक पर दौड़ती भारी-भरकम ट्रेनों का दबाव काफी ज्यादा होता है, ऐसे में सिर्फ लोहे की पटरियां ही पर्याप्त नहीं होतीं। उन्हें एक मजबूत आधार की जरूरत होती है, जो इन पत्थरों के जरिए मिलता है। यही कारण है कि बिना बलास्ट के रेलवे ट्रैक सुरक्षित और संतुलित तरीके से काम नहीं कर सकता।

पटरियों को मजबूती से थामे रखते हैं


जब भारी-भरकम ट्रेन ट्रैक पर दौड़ती है, तो पटरियों पर जबरदस्त दबाव पड़ता है। ऐसे में ये पत्थर आपस में फंसकर एक मजबूत आधार तैयार करते हैं, जिससे पटरियां अपनी जगह पर स्थिर बनी रहती हैं। अगर ये न हों, तो ट्रैक हिल सकता है और हादसे का खतरा बढ़ सकता है।

वजन को बराबर फैलाने में मददगार

ट्रेन का पूरा भार सीधे पटरियों पर पड़ता है, लेकिन ये पत्थर उस दबाव को चारों ओर फैलाकर जमीन तक पहुंचाते हैं। इससे पटरियों पर असमान दबाव नहीं पड़ता और उनकी उम्र भी बढ़ती है।

बारिश में भी नहीं होता जलभराव

बलास्ट पत्थरों के बीच छोटे-छोटे गैप होते हैं, जो पानी को आसानी से नीचे बहने देते हैं। इससे ट्रैक के आसपास पानी जमा नहीं होता और जंग या कमजोरी से बचाव होता है।

शोर और कंपन को करते हैं कम

ट्रेन के गुजरने से पैदा होने वाला कंपन और आवाज इन पत्थरों की वजह से काफी हद तक कम हो जाता है। ये पत्थर शॉक एब्जॉर्बर की तरह काम करते हैं, जिससे आसपास का माहौल शांत रहता है।

तापमान के असर से बचाव

गर्मी में पटरियां फैलती हैं और सर्दी में सिकुड़ती हैं। ऐसे में ये पत्थर उन्हें थोड़ा लचीलापन देते हैं, जिससे तापमान के बदलाव का असर संतुलित रहता है और ट्रैक में दरारें नहीं पड़तीं।

घास-फूस को उगने से रोकते हैं

अगर ट्रैक के नीचे मिट्टी होती, तो वहां पौधे उग सकते थे, जिससे पटरियां कमजोर हो जातीं। लेकिन पत्थरों में पोषक तत्व नहीं होते, इसलिए ये पौधों को उगने नहीं देते।

अगर ये पत्थर हटा दिए जाएं तो?

सोचिए अगर ये बलास्ट पत्थर न हों, तो पटरियां ढीली पड़ सकती हैं, जमीन में धंस सकती हैं और ट्रेन का सफर खतरनाक हो सकता है। यानी ये छोटे-छोटे पत्थर ही रेलवे ट्रैक की असली ताकत हैं।

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