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Jain Dharm: साधु-साध्वी की जीवनशैली में ये नियम जानकर चौंक जाएंगे आप

Jain Dharm: क्या आप जानते हैं कि जैन साधु-साध्वी पानी से स्नान क्यों नहीं करते? ये सिर्फ तपस्या नहीं, बल्कि एक रहस्य है! कारण है  हर नहाने में सूक्ष्म जीवों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। लेकिन यही नहीं, उनके इस अनोखे नियम के पीछे छिपा है एक गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्य, जो मन और आत्मा की शुद्धि से जुड़ा है

MoneyControl Newsअपडेटेड Aug 25, 2025 पर 1:15 PM
Jain Dharm: साधु-साध्वी की जीवनशैली में ये नियम जानकर चौंक जाएंगे आप
Jain Dharm: जैन साधु-साध्वियों के लिए स्नान सिर्फ शारीरिक सुख है, जिसे वे तपस्या में बाधक मानते हैं।

जैन साधु-साध्वियों का जीवन अत्यंत सादगी और अनुशासन से भरा होता है। दीक्षा लेने के बाद वो न केवल भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग करते हैं, बल्कि स्नान जैसी सामान्य आदतों को भी छोड़ देते हैं। ये केवल कठोर तपस्या का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी दार्शनिक सोच छिपी है। जैन धर्म अहिंसा को सर्वोच्च धर्म मानता है, और ये  माना जाता है कि स्नान के दौरान असंख्य सूक्ष्म जीवों का नाश हो सकता है। जीवों की रक्षा और आत्मसंयम के मार्ग पर चलते हुए साधु-साध्वियां बाहरी शरीर की सफाई से अधिक मन और आत्मा की शुद्धि को प्राथमिकता देते हैं।

उनका मानना है कि जब मन से क्रोध, लोभ, अहंकार और ईर्ष्या जैसे नकारात्मक भाव समाप्त हो जाते हैं, तभी सच्ची पवित्रता प्राप्त होती है। यही कारण है कि वे आत्मचिंतन, ध्यान और तपस्या के जरिए अपने भीतर की गंदगी को दूर करते हैं, जिसे वे वास्तविक स्नान मानते हैं।

मन को धोना ही सबसे बड़ा स्नान

जैन साधु-साध्वियों के लिए असली शुद्धि बाहरी नहीं, आंतरिक होती है। वे ध्यान और तपस्या के जरिए क्रोध, लालच, ईर्ष्या और अहंकार जैसे नकारात्मक भावों को मिटाते हैं। उनके मुताबीक, जब मन शुद्ध हो जाता है तो पूरा शरीर भी पवित्र हो जाता है ये स्नान पानी से कहीं गहरा माना जाता है।

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