वेनेजुएला के बाद अमेरिका के टारगेट पर है अब ये देश, ट्रंप ने कर ली 2026 के आखिर तक सत्ता ढहाने की तैयारी!

इस नई रणनीति की वजह बना है अमेरिका का हालिया अभियान “ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व”, जिसके तहत वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़ लिया गया। इस सफलता के बाद ट्रंप और उनके सलाहकारों को लगता है कि क्यूबा इस समय सबसे कमजोर स्थिति में है, खासकर सोवियत संघ के टूटने के बाद से

अपडेटेड Jan 22, 2026 पर 8:32 PM
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वेनेजुएला के बाद अमेरिका के टारगेट पर अब ये देश, ट्रंप ने कर ली 2026 के आखिर तक सत्ता ढहाने की तैयारी!

वेनेजुएला में बड़ी राजनीतिक सफलता के बाद अब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नजर क्यूबा पर टिकी है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने अपनी “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत क्यूबा में करीब 70 साल से चल रहे कम्युनिस्ट शासन को 2026 के अंत तक खत्म करने का लक्ष्य रखा है। अमेरिका का यह रुख क्यूबा पर दबाव बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे अमेरिका-क्यूबा रिश्तों, क्षेत्रीय स्थिरता और क्यूबा की राजनीति में बड़े बदलाव की आशंका जताई जा रही है।

इस नई रणनीति की वजह बना है अमेरिका का हालिया अभियान “ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व”, जिसके तहत वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़ लिया गया। इस सफलता के बाद ट्रंप और उनके सलाहकारों को लगता है कि क्यूबा इस समय सबसे कमजोर स्थिति में है, खासकर सोवियत संघ के टूटने के बाद से।

अब तक क्यूबा को वेनेजुएला से तेल और आर्थिक मदद मिलती रही है। लेकिन अब वेनेजुएला की ऊर्जा आय पर अमेरिका का असर बढ़ गया है और वहां की नई सरकार पर क्यूबा से दूरी बनाने का दबाव है। इससे क्यूबा की आर्थिक जीवनरेखा टूट गई है।


अमेरिका अब क्यूबा पर जानबूझकर आर्थिक दबाव बना रहा है। वेनेजुएला से मिलने वाला तेल पूरी तरह रोककर क्यूबा की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, ताकि वहां अंदरूनी विद्रोह या सरकारी व्यवस्था के टूटने की स्थिति पैदा हो सके।

अंदर से बदलाव की रणनीति

अमेरिका सिर्फ बाहर से दबाव नहीं डाल रहा, बल्कि “अंदर से बदलाव” की रणनीति भी अपना रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी और सेना के उन बड़े अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश कर रहा है, जो मौजूदा हालात से नाराज हो सकते हैं।

ऐसे लोगों को सुरक्षा और भविष्य की सरकार में भूमिका का वादा किया जा रहा है, ताकि वे मौजूदा शासन से अलग हो जाएं।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कथित तौर पर क्यूबा में संभावित बदलाव के बाद की तीन-चरणीय योजना भी तैयार की है:

  • स्थिरता- तुरंत मानवीय मदद देना और जरूरी ढांचे को सुरक्षित करना, ताकि बड़े पैमाने पर पलायन न हो
  • पुनर्निर्माण- ऊर्जा क्षेत्र में सुधार और निजी कारोबार को बढ़ावा
  • राजनीतिक बदलाव- कम्युनिस्ट शासन के बाद नई सरकार की स्थापना

अमेरिका को उम्मीद है कि क्यूबा की नई पीढ़ी के नेता, पुराने नेताओं की तुलना में कम सख्त सोच वाले हैं और देश को बचाने के लिए अलग रास्ता चुन सकते हैं।

अंदरूनी कमजोरियां और वैश्विक असर

ट्रंप प्रशासन मानता है कि क्यूबा की सत्ता में पीढ़ियों के बीच मतभेद बढ़ सकते हैं। पुराने नेता जैसे राउल कास्त्रो और राष्ट्रपति मिगुएल डियाज़-कनेल को अलग-थलग करने की कोशिश हो सकती है।

हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि क्यूबा में कोई मज़बूत विपक्ष नहीं है, इसलिए सत्ता परिवर्तन अनिश्चित और जोखिम भरा हो सकता है।

अमेरिका के भीतर भी इसे ट्रंप की चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। खासकर फ्लोरिडा में रहने वाले क्यूबा और वेनेजुएला मूल के मतदाताओं को खुश करने की कोशिश मानी जा रही है। आलोचकों का कहना है कि ज्यादा जल्दबाज़ी हालात को और बिगाड़ सकती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असर

अब क्यूबा एक बड़े भूराजनीतिक संघर्ष के केंद्र में आ गया है। वेनेजुएला की मदद खत्म होने के बाद और रूस-चीन जैसे देश अमेरिका के दबाव को संतुलित करने की कोशिश कर सकते हैं।

क्यूबा सरकार ने अमेरिकी दबाव को विदेशी हस्तक्षेप बताते हुए खारिज किया है और अपनी संप्रभुता की बात दोहराई है। हालांकि देश में आर्थिक संकट के चलते जनता में नाराज़गी भी बढ़ रही है।

आगे क्या?

विशेषज्ञ देख रहे हैं कि क्या अमेरिका सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित रहेगा या फिर ठोस कदम उठाएगा। क्यूबा का भविष्य अनिश्चित है, क्योंकि उसने दशकों से बाहरी दबाव झेला है और फिर भी सत्ता नहीं बदली।

क्यूबा को लेकर ट्रंप की यह आक्रामक नीति दिखाती है कि अमेरिका अपने विरोधियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने को तैयार है, लेकिन यह साफ नहीं है कि इससे शांतिपूर्ण और स्थायी बदलाव आ पाएगा या नहीं।

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