अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बनाए गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पाकिस्तान को सदस्य के तौर पर शामिल किया गया है। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मकसद संघर्ष से प्रभावित इलाकों में स्थिरता लाना और स्थायी शांति कायम करना बताया गया है। भारत को भी इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता दिया गया है, लेकिन भारत ने अब तक इस पर कोई जवाब नहीं दिया है। यह बोर्ड शुरुआत में गाजा के पुनर्निर्माण के लिए बनाया गया था।
हालांकि, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का ट्रंप और दूसरे देशों के नेताओं के साथ मंच साझा करना भारत को पसंद नहीं आ सकता। भारत पहले ही पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगाता रहा है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का भी जिक्र किया गया है।
बड़ी बात है कि इजरायल ने भी पाकिस्तान को बोर्ड में शामिल किए जाने पर सवाल उठाए हैं।
इस महीने की शुरुआत में भारत में इजरायली राजदूत रेवेन अजार ने NDTV से कहा था कि गाजा में किसी भी जमीनी मिशन में पाकिस्तानी सेना की भूमिका उन्हें स्वीकार नहीं है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान से जुड़े आतंकी संगठनों और हमास के बीच बढ़ते संबंध इजरायल के लिए चिंता का विषय हैं।
इजरायल के अर्थव्यवस्था मंत्री निर बरकत ने भी साफ कहा कि किसी भी संक्रमणकालीन या पुनर्निर्माण मिशन में पाकिस्तानी सैनिकों की मौजूदगी “अस्वीकार्य” है।
'बोर्ड ऑफ पीस' में कौन-कौन शामिल
अमेरिका, पाकिस्तान और सऊदी अरब के अलावा इस बोर्ड में अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, पराग्वे, उज्बेकिस्तान, आर्मेनिया और अजरबैजान शामिल हैं। हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी इसके सदस्य हैं।
ट्रंप ने कहा कि “हर कोई इस बोर्ड का हिस्सा बनना चाहता है” और अमेरिका संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य संस्थाओं के साथ भी काम करेगा। उन्होंने बताया कि बोर्ड पहले गाज़ा पर ध्यान देगा और बाद में बाकी दुनिया के मुद्दों पर काम करेगा।
डोनाल्ड ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष होंगे। बोर्ड के नियमों के मुताबिक, अध्यक्ष को इसके ढांचे में बदलाव करने या नई इकाइयां बनाने का पूरा अधिकार होगा।
ट्रंप कार्यकारी बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति भी करेंगे और वे दो साल के कार्यकाल के लिए होंगे।
एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, ट्रंप व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद भी इस बोर्ड के अध्यक्ष बने रह सकते हैं, जब तक वे खुद इस्तीफा न दें।
इस बोर्ड से फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस और चीन जैसे बड़े देश दूर हैं। चीन ने न्योता मिलने की पुष्टि तो की है, लेकिन कहा है कि वह संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका का समर्थन करता रहेगा।