चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग से लगता है कि चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का भरोसा उठ गया है। पार्टी को जिनपिंग अब चीन की लॉन्ग टर्म स्थिरता के लिए एक लायबिलिटी लग रहे हैं। इसके चलते पार्टी उनकी जगह ले सकने वाले नए चेहरे तलाश रही है। यह बात CNN-News18 को सूत्रों से पता चली है। उनका कहना है कि CCP के वरिष्ठ नेता, शी की वैचारिक कट्टरता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रामक रुख से निराश हैं। उनका मानना है कि इसने चीन की स्थिरता और छवि दोनों को नुकसान पहुंचाया है।
CCP और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच आम सहमति यह है कि शी का वैचारिक मॉडल अब प्रभावी नहीं है। सूत्रों का कहना है कि शी के सेंट्रलाइजेशन और वैचारिक कैंपेन्स ने CCP के अंदर प्रमुख गुटों को निराश किया है। सभी पर लगातार जासूसी करने से चीन का टेक्नोलॉजिकल बेस कमजोर हो रहा है और संस्थागत मनोबल गिर रहा है। ली शांगफू और किन गैंग जैसे उनके भरोसेमंद अधिकारियों को हटाने से आंतरिक असुरक्षा और बढ़ गई है।
दो नाम प्रमुखता से सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक खुफिया सूत्रों से पता चला है कि पहला नाम जनरल झांग योउशिया का है, जो सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के पहले वाइस चेयरमैन हैं। वह पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के पीछे की रियल पावर के तौर पर उभरे हैं। उन्हें कभी शी का करीबी माना जाता था। लेकिन अब वह एक स्वतंत्र सैन्य नीति अपना रहे हैं। उन्हें हू जिंताओ और वेन जियाबाओ जैसे पूर्व नेताओं का सपोर्ट हासिल है। जनरल झांग का बढ़ता कद इस ओर इशारा करता है कि सेना अब शी की सीधी पकड़ से बाहर निकल रही है।
दूसरा नाम वांग यांग का है, जो कि पूर्व उप-प्रधानमंत्री हैं। वह एक उदारवादी और तकनीकी विशेषज्ञ माने जाते हैं। वांग यांग की छवि एक क्लीन गवर्नेंस रिकॉर्ड वाले और आर्थिक विशेषज्ञता रखने वाले व्यक्ति की है। उनके काम को वैश्विक निवेशकों के बीच सराहा जा चुका है। हालांकि अभी यांग सत्ता में नहीं हैं, लेकिन खुफिया रिपोर्टें बताती हैं कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उन्हें शी के बाद का विकल्प मान रहे हैं। पार्टी एक ऐसा नेता तलाश रही है, जो प्राइवेट सेक्टर में गिर रहे विश्वास को फिर से बढ़ा सके, विदेशी निवेश को रिवाइव कर सके और नीतियों में स्थिरता ला सके।
अगर दांव झांग योउशिया पर लगता है तो चीन की सेना लद्दाख, ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे क्षेत्रों में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकती है। घरेलू असंतोष से ध्यान भटकाने के लिए सैन्य टकरावों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं अगर वांग यांग के हाथ में सत्ता जाती है तो चीन एक बार फिर आर्थिक कूटनीति की ओर झुक सकता है, और सीमित रूप से आर्थिक और सीमा से जुड़ी बातचीत के लिए दरवाजे खोल सकता है।