समुद्र की गहराई में मिली 'गोल्ड किचन', जहां खुद ब खुद बनता है सोना! वैज्ञानिकों ने कर दिया कमाल

Gold Kitchen: समुद्र की गहराई में एक जगह है, जिसे वैज्ञानिक पृथ्वी की ‘सोने की रसोई’ (Earth’s ‘gold kitchen’) कह रहे हैं। नई रिसर्च बताती है कि ये सोना आइलैंड आर्क्स के गहरे अंदर जमा होता है, लेकिन यह किसी एक प्रक्रिया की वजह से नहीं बल्कि बार-बार होने वाले उच्च तापमान की वजह से बनता है

अपडेटेड Apr 09, 2026 पर 8:00 PM
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समुद्र की गहराई में मिली 'गोल्ड किचन', जहां खुद ब खुद बनता है सोना! (IMAGE- AI Generated)

खौलता हुआ लावा, टकराती समुद्री प्लेटें और पाताल की गहराई में छिपा एक ऐसा राज जिसे विज्ञान ने अब जाकर सुलझाया है! जर्मनी के GEOMAR सेंटर के वैज्ञानिकों ने समुद्र के सीने को चीरकर उसके नीचे छुपे सोने के विशान भंडार का पता लगा लिया है। सुनने में दादी-नानी की जुबानी किसी काल्पनिक कहानी जैसा लग रह होगा, लेकिन विज्ञान की दुनिया में इसे 'मेंटल अल्केमी' कहा जाता है। आखिर समुद्र के नीचे सोने के विशाल भंडार कैसे बनते हैं? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने केर्माडेक आर्क से निकले ज्वालामुखी के कांच के 66 सैंपल की चीर-फाड़ की।

समुद्र की गहराई में एक जगह है, जिसे वैज्ञानिक पृथ्वी की ‘सोने की रसोई’ (Earth’s ‘gold kitchen’) कह रहे हैं। नई रिसर्च बताती है कि ये सोना आइलैंड आर्क्स के गहरे अंदर जमा होता है, लेकिन यह किसी एक प्रक्रिया की वजह से नहीं बल्कि बार-बार होने वाले उच्च तापमान की वजह से बनता है।

जहां एक समुद्री प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धंसती है , वहां ज्वालामुखी द्वीपीय चाप (volcanic island arcs) बनते हैं। इन इलाकों में सोना बहुत ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। वैज्ञानिक इसकी वजह को लेकर लंबे समय से बहस कर रहे थे।


मेंटल पिघलने से बनता है सोना!

SciTechDaily के अनुसार, जर्मनी के कील स्थित Helmholtz Centre for Ocean Research GEOMAR के समुद्री भूवैज्ञानिक डॉ. क्रिश्चियन थिम्म की टीम ने इस बारे में कुछ नई जानकारी दी है।

डॉ. थिम्म ने बताया, “हमारी रिसर्च से पता चलता है कि आइलैंड आर्क्स के नीचे पानी वाले मेंटल का पिघलना सोने बनने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब हम इन परिस्थितियों में मेंटल कैसे काम करता है, उसे देखते हैं तो यह मूल रूप से एक मल्टी-स्टेज (कई चरणों वाला) पिघलने का सिस्टम है, जो धीरे-धीरे सोने को बनाता, इकट्ठा और बढ़ाता जाता है।”

'जादुई कांच' में छिपा होता है सोने का राज

वैज्ञानिकों ने न्यूजीलैंड के उत्तर में स्थित केर्माडेक आइलैंड (Kermadec Island) के पास समुद्र की तलहटी से ज्वालामुखी के कांच के 66 नमूने लिए। ये कांच तब बनते हैं, जब ज्वालामुखी का खौलता हुआ लावा पानी के नीचे अचानक ठंडा हो जाता है, जिससे उसके अंदर के असली केमिकल जस के तस बने रहते हैं।

वैज्ञानिकों को इन सैंपल में कुछ ऐसे 'पुराने कांच' मिले जो मैग्मा (पिघला हुआ पत्थर) के शुरुआती रूप को दिखाते हैं। रिसर्च में पता चला कि इन नमूनों में सोने की मात्रा समुद्र के अन्य हिस्सों के मुकाबले कई गुना ज्यादा थी। इसने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया कि आखिर यहां इतना सोना कहां से आ रहा है?

इस गुत्थी को सुलझाने के लिए टीम ने सिर्फ सोने की ही नहीं, बल्कि उसके 'करीबी दोस्तों' जैसे- चांदी, तांबा, सल्फर और प्लेटिनम की भी जांच की। ये सभी तत्व पिघलते समय एक जैसा व्यवहार करते हैं।

इन तत्वों की गहराई से जांच करने पर वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि धरती की गहराई (Mantle) में ऐसी क्या हलचल होती है, जिससे सोना भारी मात्रा में बाहर आता है। यह खोज हमें बताती है कि प्रकृति पाताल की गहराइयों में किस तरह की 'भट्टी' चला रही है, जिससे कीमती धातुओं के भंडार तैयार होते हैं।

वैज्ञानिकों ने जाना कैसे बनता है सोना

वैज्ञानिकों ने धरती की परत (Mantle) से आने वाले गुप्त संकेतों को डिकोड कर लिया है। रिसर्च से पता चला है कि केर्माडेक आर्क के नीचे मौजूद धरती की परत तब पिघलती है, जब वह बहुत ज्यादा तापमान पर पानी के संपर्क में आती है। इस खास स्थिति में जो मैग्मा (पिघला हुआ पत्थर) बनता है, उसमें चांदी और तांबे का अनुपात बिल्कुल वैसा ही होता है, जैसा धरती की गहराई में पाया जाता है।

वैज्ञानिकों ने देखा कि इन चट्टानों में शुरुआती तौर पर सोने की मात्रा उम्मीद से कहीं ज्यादा थी- तकरीबन 6 नैनोग्राम प्रति ग्राम। यहां तांबे के मुकाबले सोने का अनुपात सामान्य समुद्री चट्टानों की तुलना में बहुत ज्यादा पाया गया। इसका मतलब है कि यह इलाका सोने के मामले में कुदरती तौर पर बहुत अमीर है।

जांच में एक अनोखा पैटर्न सामने आया। ऐसा लगता है कि यहां की जमीन पहले एक बार पिघलकर खाली हो चुकी थी और फिर से पिघली। जब मेंटल बहुत ऊंचे तापमान पर बार-बार पिघलता है और उसमें ऑक्सीजन की मात्रा बदलती है, तो वह सोना उगलने लगता है।

भूवैज्ञानिक नजरिए से देखें तो ये काफी सोना है, लेकिन खनन के लिए ये बहुत कम हैं। इसका मतलब है कि भले ही समुद्र में खनिज मौजूद हैं, लेकिन उनकी मात्रा इतनी कम है कि उन्हें निकालना और प्रोसेस करना महंगा होगा, जिससे यह आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं होगा।

जब पृथ्वी के अंदर मौजूद मेंटल बार-बार पिघलता है

शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगा था कि सबडक्शन जोन (जहां एक टेक्टोनिक प्लेट दूसरी के नीचे जाती है) से निकलने वाला पानी सीधे तौर पर सोने की मात्रा बढ़ाता है। लेकिन टिम्म के मुताबिक, असल में पानी का काम मेंटल को पिघलाना है। सोने की ज्यादा मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि चट्टान कितनी बार और कितनी ज्यादा गर्मी में पिघलती है।

सोना चट्टानों में कैसे जुड़ा होता है, यह भी बहुत जरूरी है। टिम्म बताते हैं कि मेंटल में सोना आमतौर पर सल्फाइड मिनरल्स में बंधा रहता है। जब तापमान बहुत ज्यादा होता है और चट्टान पिघलती है, तो ये मिनरल्स टूट जाते हैं और सारा सोना पिघले हुए पदार्थ (मैग्मा) में मिल जाता है।

उन्होंने यह भी बताया कि सोने की ज्यादा मात्रा किसी एक बार के पिघलने से नहीं बनती। इसके लिए चट्टानों को बार-बार पिघलना पड़ता है। यानी, जितनी बार चट्टान पिघलेगी, उतना ही सोना उसमें इकट्ठा होकर ज्यादा कंसंट्रेटेड होता जाएगा।

सोने की पूरी लाइफ साइकिल

यह स्टडी इसलिए खास है, क्योंकि यह बताती है कि समुद्र के अंदर बनने वाले द्वीपीय इलाकों (जैसे केर्माडेक आर्क) में सोने के भंडार कैसे बनते हैं। इसमें पता चला कि मैग्मा में सोने की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि मेंटल कितनी बार पिघलता है और इस प्रक्रिया को पानी आसान बना देता है।

इससे यह भी समझ आता है कि भले ही सोने के भंडार धरती की सतह के पास बनते हैं, लेकिन उनके पीछे मेंटल के अंदर होने वाले केमिकल रिएक्शन बहुत अहम होते हैं।

यह खोज यह भी समझाने में मदद कर सकती है कि समुद्र के नीचे ज्वालामुखीय इलाकों में बनने वाले हाइड्रोथर्मल सल्फाइड भंडार अक्सर सोने से भरपूर क्यों होते हैं। टिम्म के अनुसार, जो प्रक्रिया उन्होंने समझी है, वही शायद सबडक्शन जोन में हाइड्रोथर्मल सिस्टम में ज्यादा सोना होने की वजह हो सकती है। हालांकि इस कड़ी को पूरी तरह समझने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है।

टिम्म कहते हैं कि असल में वे सोने की लाइफ साइकिल की शुरुआत को देख रहे हैं। यानी, सोना सबसे पहले मेंटल से निकलकर मैग्मा में आता है, और यही मैग्मा आगे चलकर ज्वालामुखी बनाता है। मतलब, सोना सतह तक पहुंचने से बहुत पहले ही उसकी कहानी शुरू हो जाती है।

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