IMF Warning: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच अभी भी युद्ध जारी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने इसे लेकर एक विश्लेषण किया है और चेतावनी दी है कि यह युद्ध दुनिया के लिए एक 'बड़ा झटका' साबित हो सकता है। IMF के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, ईरान युद्ध उन देशों की उम्मीदों पर पानी फेर रहा है जो हाल ही में पिछले संकटों से उबरना शुरू हुए थे।
क्यों और कैसे बढ़ेगी वैश्विक महंगाई?
IMF का कहना है कि इस संकट का असर पूरी दुनिया पर एक जैसा नहीं होगा, लेकिन इसके नतीजे 'कम विकास दर और ज्यादा महंगाई' के रूप में सामने आएंगे। अमीर देशों की तुलना में गरीब और विकासशील देश खासकर एशिया और अफ्रीका के तेल आयातक देश इस झटके की चपेट में सबसे पहले आएंगे। 'होर्मुज जलडमरूमध्य' में तनाव के कारण दुनिया की 25-30% तेल सप्लाई और 20% गैस सप्लाई खतरे में है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। डोनाल्ड ट्रंप की ईरान के तेल क्षेत्रों को निशाना बनाने की धमकी ने बाजार में और डर पैदा कर दिया है।
एनर्जी के बाद 'भोजन' पर संकट
IMF ने सचेत किया है कि यह संकट केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रसोई तक भी पहुंचेगा। खाड़ी देशों से होने वाली फर्टिलाइजर की सप्लाई बाधित होने और ईंधन महंगा होने से खेती की लागत बढ़ेगी। इसका सबसे बुरा असर कम आय वाले देशों पर पड़ेगा, जहां एक परिवार अपनी कमाई का औसतन 36% हिस्सा केवल खाने पर खर्च करता है। वहीं अमीर देशों में यह खर्च केवल 9% ही है। भोजन और ईंधन की बढ़ती कीमतें कई देशों में विरोध प्रदर्शन और सामाजिक अस्थिरता का कारण बन सकती हैं।
आर्थिक विकास की रफ्तार पर ब्रेक
IMF की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध लंबा खिंचने पर दुनिया को 'स्टैगफ्लेशन' यानी महंगाई बढ़ना और विकास दर गिरना जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। वैश्विक स्तर पर वित्तीय स्थितियां सख्त हो रही हैं, जिससे कर्ज लेना महंगा हो जाएगा और आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ जाएंगी। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों और यूरोप की उन अर्थव्यवस्थाओं के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी जो कच्चे माल के लिए बाहरी सप्लाई पर निर्भर हैं।
भविष्य को लेकर क्या है IMF का नजरिया?
IMF के अनुसार, नुकसान कितना होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि युद्ध कितने समय तक चलता है। फिलहाल संभावना ये है कि तनाव लंबे समय तक बना रहेगा लेकिन पूर्ण युद्ध नहीं होगा, जिससे कीमतें ऊंची रहेंगी और महंगाई बनी रहेगी। IMF अप्रैल में होने वाली अपनी स्प्रिंग मीटिंग्स में 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' के जरिए इसका विस्तृत आकलन पेश करेगा।