Iran-US Talks: ईरान और अमेरिका के बीच 28 फरवरी से ही तनाव चल रहा था। युद्ध के करीब 37 दिन बाद 8 अप्रैल को दोनों देशों के बीच 14 दिनों का सीजफायर समझौता हुआ। फिर दोनों देशों के बीच पाकिस्तान के इस्लामाबाद में शांति प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई। हालांकि, इस्लामाबाद में 21 घंटों तक चली ऐतिहासिक मैराथन शांति वार्ता विफल रही। अब एक बार फिर से अमेरिका और ईरान के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। ईरानी मीडिया और राजनयिकों ने वाशिंगटन पर 'अतार्किक मांगें' रखने का आरोप लगाया है, वहीं अमेरिका ने साफ कर दिया है कि उसका 'फाइनल ऑफर' अब ईरान के पाले में है।
'21 घंटे की नॉनस्टॉप बातचीत और अमेरिका की जिद'
ईरान के सरकारी प्रसारक IRIB ने टेलीग्राम पर एक बयान जारी कर कहा कि, उनके प्रतिनिधिमंडल ने देश के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए लगातार 21 घंटे तक गहन बातचीत की। ईरान का दावा है कि उन्होंने कई सकारात्मक पहल कीं, लेकिन अमेरिका की 'अतार्किक मांगों' के कारण कोई प्रगति नहीं हो सकी।
घाना में ईरान के दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर और भी कड़ा रुख अपनाते हुए लिखा, 'अमेरिका ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को आधी दुनिया पार करवाकर इस्लामाबाद भेजा, लेकिन वे खाली हाथ लौट रहे हैं। उन्होंने वह सब मांग लिया जो वे युद्ध के जरिए हासिल नहीं कर सके थे। ईरान ने इसके जवाब में 'BIG NO' कह दिया है।'
ईरानी दूतावास ने सीधे तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप और जेडी वेंस पर निशाना साधते हुए कहा, 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' अभी भी बंद है और अमेरिका बिना किसी समझौते के लौट रहा है। दूतावास ने दावा किया कि वाशिंगटन के पास अब अपना सम्मान बचाने के लिए कोई विकल्प नहीं बचा है।
दूसरी ओर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस एयरफोर्स टू विमान में सवार होकर पाकिस्तान से रवाना हो गए हैं। जाने से पहले उन्होंने कहा, 'हम यहां से अपना आखिरी और सबसे बेहतरीन प्रस्ताव छोड़कर जा रहे हैं। अब देखना होगा कि ईरानी इसे स्वीकार करते हैं या नहीं।'
वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ईरान से एक 'बुनियादी प्रतिबद्धता' चाहता था कि वे कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे, लेकिन ईरान इसके लिए तैयार नहीं दिखा। यही इस पूरी वार्ता के विफल होने की सबसे बड़ी वजह रही।
क्या रहे विवाद के मुख्य बिंदु?
मोहम्मद बगेर कलीबाफ और अब्बास अरागची के नेतृत्व वाले ईरानी दल ने प्रतिबंधों में ढील और लेबनान में इजरायली हमलों को रोकने की मांग की। वहीं वाशिंगटन ने स्पष्ट कर दिया कि लेबनान का मुद्दा इस चर्चा का हिस्सा नहीं है। दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप ने भी बातचीत के दौरान ही सख्त लहजे में कहा था, 'समझौता हो या न हो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता... हम जीत चुके हैं।'
अनिश्चितता के साये में मिडिल ईस्ट
28 फरवरी को शुरू हुए इस संघर्ष ने वैश्विक तेल बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता को हिलाकर रख दिया है। अमेरिका ने अपना अंतिम प्रस्ताव मेज पर रख दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस पर है कि तेहरान इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है। वहीं दूसरी तरफ होर्मुज जलसंधि के बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।