'पाकिस्तान एक और युद्ध नहीं झेल सकता...', PAK सेना से नाराज हुआ पश्तून मौलाना फजलुर रहमान

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने सेना को चेतावनी देते हुए कहा, “1971 का बांग्लादेश और 1999 का कारगिल मत भूलो। ये परवेज मुशर्रफ और कुछ दूसरे सैन्य अफसरों की गलतियों के उदाहरण हैं, जिनकी वजह से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख खराब हुई

अपडेटेड Oct 31, 2025 पर 6:04 PM
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भारत ने ' ऑपरेशन सिंदूर' से पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया कि पड़ोसी मुल्क में हड़कंप मच गया।

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने ' ऑपरेशन सिंदूर' से पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया कि पड़ोसी मुल्क में हड़कंप मच गया। भारत के मिसाइल हमलों ने पाक के आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया, तो पाकिस्तानी सियासत में कोहराम मच गया। टॉप इंटेलिजेंस सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान, पाकिस्तान सेना से नाराज चल रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि अफगानिस्तान को लेकर सेना के मौजूदा रवैये पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “पाकिस्तान एक और अपनी ही शुरू की हुई जंग का खर्च नहीं उठा सकता।”

 PAK सेना से नाराज हुआ मौलाना फजलुर रहमान

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने सेना को चेतावनी देते हुए कहा, “1971 का बांग्लादेश और 1999 का कारगिल मत भूलो। ये परवेज मुशर्रफ और कुछ दूसरे सैन्य अफसरों की गलतियों के उदाहरण हैं, जिनकी वजह से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख खराब हुई।” सूत्रों के अनुसार, मौलाना फजलुर रहमान ने कहा कि सेना को बॉर्डर पर लड़ाई की बजाय खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ते आतंकवाद, आर्थिक मुश्किलों और प्रशासनिक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने सेना के उस रवैये की आलोचना की, जिसमें लोगों में डर बनाया जाता है। उनके मुताबिक, यह तरीका बिल्कुल गलत है। सूत्रों ने बताया कि मौलाना ने कहा, “इस्लाम किसी मुस्लिम पड़ोसी देश पर नाइंसाफी या बेवजह हमले की इजाजत नहीं देता।” उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान को लड़ाई नहीं, बल्कि देश के अंदर स्थिरता और शांति पर ध्यान देना चाहिए। सूत्रों के अनुसार, मौलाना फजलुर रहमान अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दे रहे थे कि अफगानिस्तान के प्रति पाकिस्तान आर्मी का रुख न तो इस्लामिक सिद्धांतों के अनुसार है और न ही राजनीतिक रूप से सही, बल्कि यह देश को नुकसान पहुँचा सकता है। इंटेलिजेंस सूत्रों का कहना है कि उनके इस बयान से भारत को पाकिस्तान आर्मी पर रणनीतिक दबाव बनाने में फायदा मिल सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय खुफिया एजेंसियां इसे अफगान तालिबान की ओर से पाकिस्तान पर मनोवैज्ञानिक दबाव के बड़े प्रयास का हिस्सा मान रही हैं। उनका कहना है कि मौलाना फज़लुर रहमान जैसी आवाज़ें पाकिस्तान के “अंदरूनी युद्ध” के नैरेटिव को कमजोर करेंगी और देश के भीतर सेना के रुख पर सवाल खड़े करेंगी। इस महीने की शुरुआत में News18 की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मौलाना फजलुर रहमान भारत आना चाहते थे और इसे वह “शांति का संदेश” करार दे रहे थे। यह जानकारी उनके करीबी सहयोगी और सीनेटर कामरान मुर्तजा ने पाकिस्तानी पत्रकार शौकत पीराचा के साथ एक टीवी इंटरव्यू में दी थी। मुर्तजा के मुताबिक, उन्होंने मौलाना का शांति संदेश एक भारतीय राजनयिक को व्यक्तिगत रूप से दिया था। यह मुलाकात एंकर मोईद पीरजादा की मौजूदगी में हुई थी, और उस भारतीय अधिकारी ने भी इस बात की पुष्टि की थी।


उस समय टॉप इंटेलिजेंस सूत्रों ने News18 को बताया था कि मौलाना का यह कदम पाकिस्तान की राजनीति और सेना में बढ़ती अंदरूनी खींचतान को दिखाता है। खासकर पंजाबी और पश्तून गुटों के बीच बढ़ रहा तनाव इसके पीछे एक बड़ी वजह माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, डेरा इस्माइल खान के रहने वाले और पश्तून समुदाय से जुड़े मौलाना फजलुर रहमान अब खुद को पश्तून असंतोष की राजनीतिक आवाज़ के रूप में पेश कर रहे हैं। सूत्रों ने यह भी कहा था कि मौलाना का शांति संदेश सिर्फ औपचारिकता नहीं है। यह इस्लामाबाद और नई दिल्लीदोनों के लिए एक संकेत है कि पाकिस्तान की सत्ता में अंदरूनी नाराज़गी असली है और लगातार बढ़ रही है।

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