Middle East ceasefire : लेबनान पर आ रहे विरोधाभासी बयान, मिडिल ईस्ट संघर्ष विराम पर मंडरा रहे खतरे के बादल

Middle East ceasefire :मिडिल ईस्ट में संघर्ष विराम पर पाकिस्तान के बयान अब ज़मीनी हकीकतों और अमेरिका के आधिकारिक बयानों से मेल नहीं खा रहे हैं,ऐसे में लेबनान की स्थिति एक ऐसे विवाद के रूप में उभरी है,जिससे इस संघर्ष-विराम के टूट जाने का खतरा पैदा हो गया है

अपडेटेड Apr 09, 2026 पर 7:43 AM
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Middle East ceasefire : पाकिस्तान की घोषणा ज़मीनी हकीकतों और अमेरिका के आधिकारिक बयानों से मेल नहीं खा रही है। लेबनान एक ऐसे कारण के रूप में उभरकर सामने आ रहा है,जिससे इस संघर्ष-विराम के टूटने का खतरा पैदा हो गया है

Middle East Crisis : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि लेबनान,अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष-विराम का हिस्सा नहीं है। उनका यह बयान ईरान के प्रस्ताव और पाकिस्तान के उस बयान से मेल नहीं खाता जिसमें कहा गया था कि यह संघर्ष-विराम को लेबनान समेत पूरे इलाके पर लागू है। पेंटागन की ब्रीफिंग के बाद PBS न्यूज़ से बात करते हुए, ट्रंप ने यह साफ़ कर दिया कि लेबनान में इज़राइली सैन्य अभियान इस समझौते के दायरे से बाहर हैं।

लेबनान के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा लेबनान को सीज़फ़ायर डील में शामिल नहीं किया गया है। इसे हिज़्बुल्लाह की वजह से बाहर रखा गया था। उन्होंने लेबनान पर हो रहे इजराइली हमलों के एक अलग झड़प बताया।

इससे पहले, ट्रंप ने बातचीत को लेकर ज़्यादा सतर्क रवैया अपनाते हुए कहा था,“हमें ईरान से 10-सूत्रीय प्रस्ताव मिला है,हमारा मानना ​​है कि यह बातचीत के लिए एक व्यावहारिक आधार है। अमेरिका और ईरान के बीच पहले के विवाद के लगभग सभी अलग-अलग बिंदुओं पर सहमति बन गई है,लेकिन दो हफ़्ते का समय इस समझौते को अंतिम रूप देने और पूरा करने के लिए काफ़ी होगा।”


इज़राइल ने लेबनान पर अमेरिका के रुख का किया समर्थन

ट्रंप की टिप्पणियां इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रुख से मेल खाती हैं, जिन्होंने यह स्पष्ट किया है कि लेबनान संघर्ष-विराम के दायरे से बाहर है।

नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि इज़राइल ईरान के साथ सीधे टकराव में अमेरिका की अगुवाई वाले संघर्ष विराम का समर्थन करता है,लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया कि यह समझौता लेबनान पर लागू नहीं होता,जहां हिज़बुल्ला के साथ लड़ाई जारी है।

बता दें कि इज़राइली सेना ने लेबनान में अपने सबसे ज़ोरदार हमलों में से एक को अंजाम दिया है,जिससे यह साफ़ होता है कि संघर्ष-विराम की घोषणा के बावजूद तेल अवीव इसे एक अलग फ्रंट मानता है।

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ईरान के प्रस्ताव में लेबनान शामिल

ईरान के प्रस्ताव में लेबनान साफ़ तौर पर शामिल है। लेकिन अमेरिका का रुख़ ईरान की शर्तों के ठीक उलट है। ईरान के दो सीनियर अधिकारियों ने 'द न्यूयॉर्क टाइम्स'को बताया कि तेहरान के 10 प्वाइंट के प्रस्ताव में इस बात की गारंटी शामिल है कि ईरान पर दोबारा हमला नहीं किया जाएगा,लेबनान में हिज़्बुल्लाह पर इज़रायल के हमलों को रोका जाएगा और सभी पाबंदियां भी हटा दी जाएंगी।"

समझौते के अतिरिक्त विवरण से पता चलता है कि ईरान के प्रस्ताव में प्रतिबंधों में राहत,ज़ब्त की गई संपत्तियों की मुक्ति और पूरे क्षेत्र में तनाव कम करने की भी मांग की गई है,जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि लेबनान उसकी शर्तों में शामिल है।

पाकिस्तान का मैसेज बना कन्फ्यूजन की वजह

इस मुद्दे पर बने कन्फ्यूजन की मुख्य वजह पाकिस्तान के बयान हैं जो इस समझौते में मीडिएटर और मैसेंजर के रोल निभा रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने सबके सामने ऐलान किया था कि सीज़फ़ायर “लेबनान समेत हर जगह” लागू होता है। जबकि, अब वॉशिंगटन और तेल अवीव दोनों ने ही इस दावे का सीधे तौर पर खंडन कर रहे हैं।

इस विरोधाभास को ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने और भी ज़्यादा उजागर कर दिया है। उन्होंने शरीफ़ की उस पोस्ट का एक स्क्रीनशॉट साझा किया है जिसमें स्पष्ट रूप से लेबनान का ज़िक्र किया गया है।

अराघची ने कहा “ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष-विराम की शर्तें स्पष्ट और साफ़ हैं। अमेरिका को संघर्ष विराम या इज़रायल के ज़रिए युद्ध जारी रखने में से एक को चुनना होगा, उसे दोनों नहीं मिल सकते”।

अराघची ने आगे कहा “दुनिया लेबनान में हो रहे नरसंहार को देख रही है। अब गेंद अमेरिका के पाले में है। दुनिया यह देख रही है कि क्या वह अपनी प्रतिबद्धताओं पर अमल करेगा।”

शरीफ़ के बयान को सामने रखकर अराघची ने प्रभावी ढंग से ईरान के इस रुख को मज़बूती दी कि लेबनान को हमेशा से ही संघर्ष-विराम का हिस्सा माना गया था, भले ही अमेरिका ने इसको नकार दिया हो।

कोई अंतिम समझौता नहीं,केवल प्रस्ताव

इन बातों से यह साफ़ होता है कि अभी तक किसी भी अंतिम समझौते को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है। हालांकि ट्रंप ने ईरान का प्रस्ताव मिलने की बात स्वीकार की और इसे समझौते का "एक व्यावहारिक आधार" बताया। लेकिन वॉशिंगटन ने इसकी शर्तों का सपोर्ट नहीं किया है।

'द गार्डियन'ने बताया है कि अमेरिका और ईरान की ओर से आए प्रस्ताव अभी भी अनसुलझे हैं। दोनों ही पक्ष ऐसे अलग-अलग ढांचों को आगे बढ़ा रहे हैं जिनमें कई अहम मुद्दों पर मतभेद हैं। इसमें यह मुद्दा भी शामिल है कि लेबनान इस समझौते के दायरे में आएगा या नहीं।

सीज़फ़ायर पर खतरे के बादल

लेबनान पर बनी असहमति अब सीज़फ़ायर के कायम रहने के लिए ही खतरा बन रही है। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर लेबनान में इज़राइली हमले जारी रहे तो वह समझौते से हट सकता है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने चेतावनी दी है कि अगर लेबनान के खिलाफ़ हमले तुरंत नहीं रोके गए तो वह जवाब देगा,जिससे फिर से तनाव बढ़ने का खतरा बढ़ जाएगा। भारत स्थित ईरानी दूतावास ने बुधवार रात उस 10-सूत्रीय प्रस्ताव को सामने रखा जिसमें स्पष्ट रूप से लेबनान का ज़िक्र किया गया है।

लेबनान बना झगड़े की जड़

इस संकट की जड़ में सीज़फ़ायर की व्याख्या को लेकर बढ़ता मतभेद है। ईरान के प्रस्ताव में लेबनान को किसी भी तनाव कम करने की प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा बताया गया है। इसी प्रस्ताव को पाकिस्तान की तरफ से भी सपोर्ट हासिल है। हालांकि,अमेरिका और इज़राइल लेबनान को संघर्ष का एक अलग मोर्चा ही मानते आ रहे हैं।

अब जब पाकिस्तान की घोषणा ज़मीनी हकीकतों और अमेरिका के आधिकारिक बयानों से मेल नहीं खा रही है,तो लेबनान एक ऐसे कारण के रूप में उभरकर सामने आ रहा है,जिससे इस संघर्ष-विराम के टूटने का खतरा पैदा हो गया है।

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