Sushila Karki: जब नेपाल के युवाओं (Gen Z) ने पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोला, तो उन्होंने किसी नेता पर नहीं, बल्कि एक पूर्व जज पर भरोसा जताया था। 73 वर्षीय सुशीला कार्की अपने 'मजबूत इरादों' और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख के लिए जानी जाती हैं। आज वो नेपाल में हो रहे सबसे महत्वपूर्ण चुनाव का नेतृत्व कर रही हैं। आइए आपको बताते हैं आखिर क्यों है वो Gen Z की पसंद।
1952 में विराटनगर में जन्मीं सुशीला कार्की का भारत से गहरा संबंध है। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री हासिल की है। 2016 में वे नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने बड़े-बड़े राजनेताओं और भ्रष्टाचार के मामलों में ऐसे फैसले सुनाए कि उन्हें 'आयरन लेडी' कहा जाने लगा।
2017 में जब उन्होंने पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के सरकारी फैसले को पलटा, तो तत्कालीन सरकार ने उन पर महाभियोग चलाने की कोशिश की। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और जनता के भारी समर्थन के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट से प्रधानमंत्री तक का सफर
2025 में जब नेपाल के Gen Z ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया और केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा, तब देश को एक निष्पक्ष चेहरे की तलाश थी। दिलचस्प बात यह है कि आंदोलनकारी युवाओं ने Discord प्लेटफॉर्म पर पोल कराया और 5 विकल्पों में से सुशीला कार्की को चुना। नेपाली सेना और राजनीतिक दलों के साथ बातचीत के बाद, राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने 12 सितंबर, 2025 को उन्हें अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। इसके साथ ही वे नेपाल के इतिहास की पहली महिला प्रधानमंत्री बन गईं।
शपथ लेने के बाद कार्की ने पारंपरिक राजनीति से हटकर काम किया। उन्होंने आंदोलन में जान गंवाने वाले युवाओं को 'शहीद' का दर्जा दिया। शपथ लेने के अगले ही दिन वे अस्पतालों में घायल युवाओं से मिलने पहुंची और उन्हें ₹10 लाख के मुआवजे का ऐलान किया। तब उन्होंने भ्रष्टाचार खत्म करने और मार्च 2026 में निष्पक्ष चुनाव कराने का संकल्प लिया।
2026 के चुनावों में है बड़ी भूमिका
आज नेपाल में जो मतदान हो रहा है, उसका पूरा श्रेय सुशीला कार्की के प्रबंधन को जाता है। वे खुद चुनाव नहीं लड़ रही हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी ने मतदाताओं, विशेषकर युवाओं में यह विश्वास जगाया है कि इस बार चुनाव में धांधली नहीं होगी।उन्होंने गृहयुद्ध जैसी स्थिति से जूझ रहे नेपाल को स्थिरता दी और एक सफल लोकतांत्रिक बदलाव का रास्ता साफ किया।