No Kings Protests: ट्रंप की नीतियों और ईरान के खिलाफ युद्ध का अमेरिका से यूरोप तक भारी विरोध, सड़कों पर उतरे लाखों लोग

US No Kings Protests: प्रदर्शनकारी मुख्य रूप से ईरान के साथ बढ़ते सैन्य संघर्ष, नागरिक स्वतंत्रता में कटौती और प्रवासियों के खिलाफ की जा रही सख्त कार्रवाई का विरोध कर रहे थे। आयोजकों का दावा है कि जनवरी 2025 में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन है

अपडेटेड Mar 29, 2026 पर 11:46 AM
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लंदन, पेरिस और रोम में हजारों लोगों ने ईरान युद्ध के कारण बढ़ते सैन्य तनाव के खिलाफ रैलियां निकालीं

No Kings Protests: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ 'नो किंग्स प्रोटेस्ट' हुआ। US के सभी 50 राज्यों के साथ-साथ लंदन, पेरिस और रोम जैसे शहरों में भी लाखों लोगों ने प्रदर्शन कर अपना विरोध दर्ज कराया। आपको बता दें कि यह विरोध प्रदर्शन विशेष रूप से ईरान के साथ जारी युद्ध और कड़े इमिग्रेशन कानूनों के खिलाफ हो रहे है।

50 राज्यों में 3,200 से अधिक जगह एकसाथ हुए प्रदर्शन

रॉयटर्स के अनुसार, न्यूयॉर्क, वाशिंगटन, लॉस एंजिल्स और डलास जैसे महानगरों के साथ-साथ इडाहो जैसे छोटे राज्यों में भी हजारों कार्यक्रम हुए। प्रदर्शनकारी मुख्य रूप से ईरान के साथ बढ़ते सैन्य संघर्ष, नागरिक स्वतंत्रता में कटौती और प्रवासियों के खिलाफ की जा रही सख्त कार्रवाई का विरोध कर रहे थे। आयोजकों का दावा है कि जनवरी 2025 में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन है। 'नो किंग्स' आंदोलन अमेरिका में एक साल के भीतर तीसरा सबसे बड़ा प्रदर्शन रहा।


मिनेसोटा बना विरोध का मुख्य केंद्र

मिनेसोटा राज्य इस आंदोलन का सांकेतिक केंद्र बनकर उभरा, जहां सेंट पॉल में एक विशाल रैली हुई। मशहूर संगीतकार ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने 'स्ट्रीट्स ऑफ मिनियापोलिस' गाना गाया। यह गाना रेनी गुड और एलेक्स प्रेटी की याद में लिखा गया है, जिनकी इस साल की शुरुआत में आव्रजन एजेंटों की गोलीबारी में मौत हो गई थी। इसके साथ ही सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने संवैधानिक मूल्यों को बचाने की अपील की, वहीं मिनेसोटा के गवर्नर टिम वाल्ज ने प्रदर्शनकारियों की लोकतांत्रिक भावना की सराहना की।

अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ जगहों पर तनाव देखा गया। लॉस एंजिल्स में एक डिटेंशन सेंटर के पास प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थरबाजी के बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। डलास में भी कुछ गिरफ्तारियां हुईं। रिपब्लिकन पार्टी और व्हाइट हाउस ने इन प्रदर्शनों को 'राजनीति से प्रेरित' बताते हुए इनकी आलोचना की है।

केवल युद्ध ही नहीं है विरोध का कारण

प्रदर्शनकारियों ने केवल ईरान युद्ध ही नहीं, बल्कि कई अन्य सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को भी उठाया। इस दौरान बढ़ती महंगाई और आर्थिक गैप के खिलाफ आवाज उठाई गई। सरकार की नई नीतियों के खिलाफ और ट्रांसजेंडर के अधिकारों को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने बैनर और पोस्टर लहराए। कई प्रदर्शनकारियों ने इस संघर्ष की तुलना अमेरिका के पुराने स्वतंत्रता आंदोलनों से की।

लंदन से पेरिस तक, वैश्विक स्तर पर दिखी गूंज

यह आंदोलन केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ट्रंप की नीतियों का विरोध हुआ। यूरोप के लंदन, पेरिस और रोम में हजारों लोगों ने 'दक्षिणपंथी राजनीति' और ईरान युद्ध के कारण बढ़ते सैन्य तनाव के खिलाफ रैलियां निकालीं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अमेरिका की युद्ध नीतियों और मानवाधिकारों के रिकॉर्ड को लेकर बढ़ती चिंता साफ दिखी।

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