अंटार्कटिका की पिघलती बर्फ के नीचे छिपा है बेशकीमती खजाना! कई देशों की चमक सकती है किस्मत; लेटेस्ट रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

Antarctica Mineral Reserves: अंटार्कटिका के खनिज भंडार के बारे में वैज्ञानिक लंबे समय से अनेक प्रकार की थ्योरी दे रहे हैं, लेकिन मोटी बर्फ की चादर के कारण अब तक वहां पहुंचना नामुमकिन था। हालांकि, हाल के सालों में बर्फ पिघलने की दर बढ़ी है जिससे अनेक प्रकार की पर्यावरणीय चिंताएं जताई जा है

अपडेटेड Apr 06, 2026 पर 1:40 PM
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रिपोर्ट के अनुसार, बर्फ के नीचे दबी जमीन बाहर आने से वहां सोना, चांदी, तांबा और प्लेटिनम जैसे खनिजों का विशाल भंडार मिल सकता है

Gold-Silver Reserves In Antarctica: जलवायु परिवर्तन के कारण अंटार्कटिका की बर्फ जिस तेजी से पिघल रही है, जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। 'नेचर क्लाइमेट चेंज' में प्रकाशित एक नई रिसर्च में अंटार्कटिका को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, बर्फ के नीचे दबी जमीन बाहर आने से वहां सोना, चांदी, तांबा और प्लेटिनम जैसे खनिजों का विशाल भंडार मिल सकता है।

ईरिका एम. लुकास के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने अनुमान लगाया है कि साल 2300 तक अंटार्कटिका में 1,20,000 वर्ग किलोमीटर नई बर्फ-मुक्त जमीन उभर सकती है जो आज के स्तर से 550% की भारी बढ़ोतरी है।

बर्फ के नीचे क्या छिपा है?


अंटार्कटिका के खनिज भंडार के बारे में वैज्ञानिक लंबे समय से अनेक प्रकार की थ्योरी दे रहे हैं, लेकिन मोटी बर्फ की चादर के कारण अब तक वहां पहुंचना नामुमकिन था। करोड़ों साल पहले अंटार्कटिका 'गोंडवाना' महाद्वीप का हिस्सा था, जिससे अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे खनिज-समृद्ध क्षेत्र जुड़े हुए थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि जो खनिज बेल्ट इन महाद्वीपों में हैं, वही अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे भी फैली हुई हैं। भूवैज्ञानिक साक्ष्यों के अनुसार, यहां सोना, चांदी, तांबा, लोहा, प्लेटिनम और कोबाल्ट के बड़े भंडार होने की प्रबल संभावना है।

किन देशों को होगा सबसे ज्यादा फायदा?

बर्फ पिघलने से सबसे ज्यादा जमीन अंटार्कटिक प्रायद्वीप में बाहर आएगी। हालांकि, इस क्षेत्र पर कई देशों के अपने-अपने क्षेत्रीय दावे हैं:

अर्जेंटीना, चिली और यूनाइटेड किंगडम: इन तीनों देशों ने इस प्रायद्वीप के क्षेत्रों पर अपना दावा पेश किया है। यहां हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन उभरने से सोना और चांदी जैसे भंडार इनके नियंत्रण में आ सकते हैं।

ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फ्रांस, नॉर्वे: ये देश भी अन्य क्षेत्रों में अपने दावों के कारण अप्रत्यक्ष रूप से लाभ उठा सकते हैं।

अमेरिका और रूस: हालांकि इन महाशक्तियों का फिलहाल कोई औपचारिक दावा नहीं है, लेकिन उनके रणनीतिक हित बहुत गहरे है और वे भविष्य में नियमों को बदलने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

2048 तक चाहकर भी कुछ नहीं किया जा सकता!

फिलहाल अंटार्कटिका में किसी भी प्रकार का व्यावसायिक खनन प्रतिबंधित है। अंटार्कटिक संधि के तहत पूरे महाद्वीप को केवल शांतिपूर्ण और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए सुरक्षित रखा गया है। खनन पर लगे इस प्रतिबंध की समीक्षा साल 2048 में की जा सकती है। जैसे-जैसे संसाधनों की कमी बढ़ेगी, इस प्रतिबंध को हटाने या नियमों को बदलने के लिए वैश्विक दबाव बढ़ सकता है।

पर्यावरण के साथ-साथ भू-राजनीतिक टकराव का है जोखिम

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि संसाधनों की यह तलाश खतरनाक भी साबित हो सकती है। खनन से अंटार्कटिका कि पारिस्थितिकी को खतरा हो सकता है। दरअसल अंटार्कटिका का पूरा इकोसिस्टम उन्हीं इलाकों में केंद्रित है जहां से बर्फ पिघल रही है। खनन से इस उसके वातावरण को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। इसके साथ ही संसाधनों की होड़ देशों के बीच आपसी टकराव को जन्म दे सकती है। दावेदार देशों के बीच सीमा विवाद और संसाधनों पर कब्जे की लड़ाई वैश्विक राजनीति को गरमा सकती है।

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