Anti-Women Laws: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने बाल विवाह को औपचारिक रूप से मान्यता दे दी है। तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने अफगानिस्तान में एक क्रूर फैमिली कानून को मंजूरी दी है। इसके तहत यदि कोई कुंवारी लड़की निकाह के नाम पर चुप रहती है, तो उसकी खामोशी को ही उसकी 'रजामंदी' मान लिया जाएगा। यह फैसला एक नए फैमिली लॉ रेगुलेशन के तहत ये फैसला लिया गया है।यह रेगुलेशन नाबालिगों की शादियों के लिए नियम तय करता है और ‘कुंवारी लड़कियों’ के लिए खास गाइडलाइन तय करता है।
तालिबान द्वारा बनाए गए नए नियमों को लेकर काफी आलोचना हो रही है। सबसे ज्यादा विवाद उस नियम को लेकर हो रहा है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई “कुंवारी लड़की” युवावस्था में पहुंचने के बाद चुप रहती है, तो उसकी चुप्पी को शादी के लिए सहमति माना जा सकता है। वहीं किसी लड़के या पहले से शादीशुदा महिला की चुप्पी को सहमति नहीं माना जाएगा। इन नियमों में “खियार अल-बुलुग” का भी जिक्र किया गया है। यह इस्लामी कानून का एक सिद्धांत है, जिसके अनुसार बचपन में शादी करने वाला व्यक्ति बड़ा होने पर उस शादी को खत्म करने की मांग कर सकता है।
अनुच्छेद 5 के अनुसार, अगर किसी नाबालिग की शादी उसके माता-पिता या दादा-दादी के अलावा किसी दूसरे रिश्तेदार ने तय की है, तब भी उस शादी को मान्यता दी जा सकती है। इसके लिए शर्त यह है कि लड़का सामाजिक रूप से उपयुक्त हो और दहेज भी स्वीकार्य माना जाए। हालांकि, ऐसी शादी को रद्द करवाने के लिए तालिबान की अदालत से मंजूरी लेना जरूरी होगा।
इस नए आदेश के तहत माता-पिता और दादा-दादी को बाल विवाह से जुड़े मामलों में काफी ज्यादा अधिकार दिए गए हैं। हालांकि, अगर किसी अभिभावक को हिंसक या नैतिक रूप से गलत पाया जाता है, तो ऐसी शादी को रद्द भी किया जा सकता है। इसके साथ ही तालिबान के न्यायाधीशों को व्यभिचार के आरोप, धर्म परिवर्तन और लंबे समय तक पति के गायब रहने जैसे मामलों में दखल देने का अधिकार भी दिया गया है।
अफगान महिलाओं पर तालिबान की पाबंदियों को लेकर बढ़ी चिंता
यह घोषणा ऐसे समय में सामने आई है, जब 2021 में सत्ता में वापसी के बाद से तालिबान को अफ़गान महिलाओं और लड़कियों पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों को लेकर दुनियाभर में आलोचना झेलनी पड़ रही है। इन पाबंदियों में महिलाओं की उच्च शिक्षा पर रोक, नौकरी करने और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने पर सीमाएं शामिल हैं। राजनीतिक टिप्पणीकार फ़हिमा महोमेद ने ‘न्यूयॉर्क पोस्ट’ से बातचीत में कहा कि बाल विवाह को किसी भी तरह सही नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा, “कोई बच्चा सही तरीके से अपनी सहमति नहीं दे सकता। किसी लड़की की चुप्पी को उसकी मंजूरी मान लेना बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे उसकी आवाज़ और अधिकार पूरी तरह दब जाते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “एक मुसलमान होने के नाते मैं इस बात को पूरी तरह गलत मानती हूं कि तालिबान के इन नियमों को पूरे इस्लाम की सोच बताया जाए। कुरान में भी जबरदस्ती और महिलाओं के साथ गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाई गई है। इसलिए तालिबान के इस रुख को व्यापक रूप से ‘इस्लामी कानून’ के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।”