ट्रंप के सलाहकारों का 'वॉर एग्जिट' प्लान पर जोर, लेकिन युद्ध रुकने के बाद भी खत्म नहीं होगा तेल संकट! जानिए क्यों?

US Exit Plan From Iran War: हाल के दिनों में तेल की कीमतों में थोड़ी राहत देखी गई थी। G7 देशों द्वारा रणनीतिक तेल भंडार जारी करने की चर्चा और ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड द्वारा 'होर्मुज जलडमरूमध्य' को फिर से खोलने के सशर्त प्रस्ताव के बाद, कच्चे तेल की कीमतें $119 प्रति बैरल के शिखर से गिरकर $94 के नीचे आ गईं। बाजार ने इसे स्थिरता की ओर कदम माना, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है

अपडेटेड Mar 10, 2026 पर 1:21 PM
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डर ये है कि तेल की बढ़ती कीमतें और शेयर बाजार में अस्थिरता का असर अमेरिकी जनता पर पड़ेगा, जिससे घरेलू राजनीति में ट्रंप को नुकसान हो सकता है

US Exit Plan From Iran War: मिडिल ईस्ट में ईरान के साथ जारी भीषण युद्ध के बीच, अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबियों और सलाहकारों ने उन्हें इस जंग से बाहर निकलने की रणनीति बनाने की सलाह देनी शुरू कर दी है। 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' की रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाइट हाउस के भीतर इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचा, तो इसके आर्थिक और राजनीतिक परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।

व्हाइट हाउस में बढ़ती बेचैनी

एक तरफ जहां राष्ट्रपति ट्रंप सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि सैन्य अभियान 'समय से आगे' और 'बिल्कुल सही' चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ उनके सलाहकार पर्दे के पीछे कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। सलाहकारों को डर है कि तेल की बढ़ती कीमतें और शेयर बाजार में अस्थिरता का असर अमेरिकी जनता पर पड़ेगा, जिससे घरेलू राजनीति में ट्रंप को नुकसान हो सकता है। हालांकि, फिलहाल व्हाइट हाउस ने आधिकारिक तौर पर किसी भी तरह की जल्दबाजी से इनकार किया है और कहा है कि ऑपरेशन पूरी ताकत से जारी रहेगा।


कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उतार-चढ़ाव

हाल के दिनों में तेल की कीमतों में थोड़ी राहत देखी गई थी। G7 देशों द्वारा रणनीतिक तेल भंडार जारी करने की चर्चा और ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड द्वारा 'होर्मुज जलडमरूमध्य' को फिर से खोलने के सशर्त प्रस्ताव के बाद, कच्चे तेल की कीमतें $119 प्रति बैरल के शिखर से गिरकर $94 के नीचे आ गईं। बाजार ने इसे स्थिरता की ओर कदम माना, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है।

'मैरीटाइम इंश्योरेंस' का संकट

कहानी का सबसे पेंचीदा हिस्सा यह है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी तेल की सप्लाई तुरंत सामान्य नहीं होगी। इसका कारण है समुद्री बीमा का गणित। दुनिया का 20% कच्चा तेल 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से गुजरता है। युद्ध शुरू होते ही प्रमुख बीमा कंपनियों ने इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों का 'वॉर रिस्क इंश्योरेंस' बंद कर दिया है।बीमा कंपनियां यूरोपीय नियमों (जैसे Directive 2009/138/EC) के तहत काम करती हैं। अगर जोखिम बहुत ज्यादा है, तो उन्हें अपनी पूंजी का एक बड़ा हिस्सा रिजर्व में रखना पड़ता है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण यह जोखिम इतना बढ़ गया है कि कंपनियों ने कवरेज देना ही बंद कर दिया है।

युद्ध जल्दी खत्म हो सकता है, लेकिन बीमा नहीं

अगर कल युद्ध रुक भी जाए, तो भी तेल का संकट 12 से 24 महीनों तक खिंच सकता है। इसके पीछे के कारण ये हैं:

एक्चुअरी डेटा: बीमा कंपनियां केवल राजनीतिक वादों पर भरोसा नहीं करतीं। वे महीनों तक डेटा देखती हैं कि मिसाइल या ड्रोन हमलों की फ्रीक्वेंसी वास्तव में कम हुई है या नहीं।

पूंजी का पुनर्गठन: जोखिम मॉडल को फिर से सेट करने और इंश्योरेंस कवरेज बहाल करने में सालों का समय लगता है।

शिपिंग की रुकावट: जब तक जहाजों को बीमा सुरक्षा नहीं मिलेगी, कमर्शियल शिपिंग कंपनियां अपने अरबों डॉलर के जहाज और कार्गो उस रास्ते पर भेजने का जोखिम नहीं उठाएंगी।

राजनीतिक जीत बनाम आर्थिक रिकवरी

वाशिंगटन में चल रही बहस दो अलग-अलग टाइमलाइन के बारे में है। एक तरफ राजनीतिक समझौता है जो युद्ध को कुछ ही दिनों में रोक सकता है। दूसरी तरफ कमर्शियल सिस्टम है, जो बहुत धीमी गति से चलता है। यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमतें युद्ध-पूर्व के स्तर से अब भी काफी ऊपर हैं। बाजार न केवल युद्ध की अवधि को देख रहा है, बल्कि उस लंबे समय को भी माप रहा है जो वैश्विक समुद्री बीमा को वापस पटरी पर लौटने में लगेगा। यानी, नेताओं के 'जीत' घोषित करने के बाद भी दुनिया को महंगे तेल की मार झेलनी पड़ सकती है।

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