Hormuz Blockade: ईरान-अमेरिका के बीच पहले दौर की शांति वार्ता फेल होने के बाद ट्रंप ने एक बड़ा एक्शन लिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में ईरान से जुड़े सभी जहाजों की नौसैनिक नाकेबंदी करने का ऐलान किया। अब यह फैसला एक बड़ा जुआ साबित हो रहा है। ट्रंप का मकसद ईरान की आर्थिक रीढ़ यानी 'तेल के खेल' को पूरी तरह खत्म करना था, लेकिन शुरुआती संकेतों से लग रहा है कि यह दांव उल्टा पड़ सकता है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में इस कदम से भरोसे के बजाय घबराहट पैदा हो गई है और ईरान ने पीछे हटने के बजाय युद्ध को और फैलाने की धमकी दे दी है।
'आर्थिक गला घोंटो और समझौते पर लाओ'
ट्रंप की रणनीति पुरानी 'मैक्सिमम प्रेशर' वाली नीति पर आधारित है। 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर शुरू की गई इस जंग में अब वे ईरान को पूरी तरह अलग-थलग करना चाहते हैं। उनका मकसद ईरान के तेल राजस्व को शून्य पर लाना था ताकि वह अपनी बात मानने के लिए मजबूर हो जाए। ट्रंप ने ये तक कहा कि नाकेबंदी को चुनौती देने वाले किसी भी ईरानी जहाज को 'तबाह' कर दिया जाएगा। उन्हें लगता है कि इस दबाव से ईरान जल्द ही उनके पास एक नई 'डील' के लिए आएगा।
'सिर्फ होर्मुज नहीं, लाल सागर भी होगा बंद'
ट्रंप के दांव के जवाब में ईरान ने जो तेवर दिखाए हैं, उसने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ईरान की 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (IRGC) ने चेतावनी दी है कि, अगर ईरान के जहाजों को रोका गया, तो वे सिर्फ फारस की खाड़ी ही नहीं, बल्कि ओमान की खाड़ी और लाल सागर को भी ब्लॉक कर देंगे। दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अगर ईरान ने इन रास्तों पर हमला किया या उन्हें बंद किया, तो वैश्विक व्यापार पूरी तरह ठप हो सकता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरान के पास तेल का इतना बड़ा भंडार है कि वह बिना निर्यात के भी महीनों तक अपनी अर्थव्यवस्था चला सकता है।
दोस्तों का भी टूटा अमेरिका से भरोसा
ट्रंप के इस कदम से अमेरिका के पुराने साथी भी असहज महसूस कर रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए होर्मुज की स्थिरता उसके अस्तित्व का सवाल है। नाकेबंदी के कारण बढ़ते खतरे ने अबू धाबी को वाशिंगटन की सोच से दूर कर दिया है। वहीं भारत, चीन और जापान जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा के लिए इस रूट पर निर्भर हैं, तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई चेन बिगड़ने के डर से इस रणनीति का समर्थन नहीं कर रहे हैं।
'एस्केलेशन ट्रैप' में फंसा अमेरिका?
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप 'एस्केलेट टू डी-एस्केलेट' यानी तनाव बढ़ाकर शांति लाने की नीति अपना रहे हैं, जो अक्सर बैकफायर करती है। इतनी व्यस्त समुद्री लेन को पूरी तरह सील करना लगभग नामुमकिन है। कुछ जहाज अब भी इस नाकेबंदी को चुनौती दे रहे हैं। अमेरिका ने हजारों अतिरिक्त सैनिक और युद्धपोत तैनात कर दिए हैं, जिससे गलती से भी युद्ध छिड़ने का खतरा बढ़ गया है।
क्या ट्रंप ने ईरान को कम आंका?
जब ट्रंप ने 28 फरवरी को यह जंग शुरू की थी, तब शायद उन्हें लगा था कि ईरान आर्थिक झटके बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। लेकिन सच्चाई अलग दिख रही है। ईरान की सेना असममित युद्ध और छद्म हमलों में माहिर है। खुद ट्रंप ने स्वीकार किया है कि उनके इस कदम से तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जो अंततः अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचाएगी।