US Iran War: ₹20,000 का ड्रोन, ₹40 लाख की मिसाइल पर भारी! महाशक्तियों को ऐसे थका रहा ईरान, लंबी जंग का इशारा
US-Israel Iran War: विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान की सोच यह हो सकती है- सस्ते ड्रोन से लगातार दबाव बनाओ, महंगी मिसाइलों को बाद के लिए बचाकर रखो, दुश्मन की आर्थिक और राजनीतिक ताकत को कमजोर करो और खाड़ी देशों की एकता में दरार डालो
US Iran War: ₹20,000 का ड्रोन, ₹40 लाख की मिसाइल पर भारी! महाशक्तियों को ऐसे थका रहा ईरान, लंबी जंग का इशारा
ईरान अब अपने जवाबी हमलों की रणनीति बदलता दिख रहा है। पहले जहां वह बड़े और एक साथ किए गए हमलों से ताकत दिखाता था, अब वह सस्ते ड्रोन के जरिए लगातार दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है। मकसद साफ है- दुश्मन की महंगी एयर डिफेंस सिस्टम को थकाना, हथियारों का स्टॉक खत्म कराना और पूरे इलाके में डर का माहौल बनाए रखना।
25 से ज्यादा लहरों में हमला
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई के बाद ईरान ने 25 से ज्यादा चरणों में बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से जवाबी हमले किए। इन हमलों का निशाना सिर्फ इजरायल ही नहीं, बल्कि खाड़ी के कई देश भी बने।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद यह संघर्ष और फैल गया। अब यह टकराव मध्य पूर्व के कई देशों तक पहुंच चुका है।
हमलों की जद में आए देश:
इजरायल
UAE
बहरीन
कुवैत
कतर
सऊदी अरब
ओमान
कुल मिलाकर, कम से कम 11 देश इस तनाव से सीधे प्रभावित हुए हैं। तेल और गैस सप्लाई पर भी असर पड़ा है और दुनिया भर के बाजारों में हलचल मच गई है।
सस्ते ड्रोन क्यों बना रहे हैं बड़ा असर?
ईरान जिस ड्रोन का ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है, वो है Shahed-136। यह ड्रोन सस्ता है, जिसकी कीमत करीब 20,000 डॉलर है और इस बनाना भी बहुत आसान है। इसे बड़ी संख्या में एक साथ लॉन्च किया जा सकता है।
इसके मुकाबले में इस्तेमाल होने वाला अमेरिकी Patriot मिसाइल सिस्टम एक इंटरसेप्टर पर लगभग 40 लाख डॉलर तक खर्च कर देता है। रणनीति साफ है
दुश्मन को हर छोटे ड्रोन को गिराने के लिए महंगा हथियार चलाना पड़े
एयर डिफेंस सिस्टम लगातार एक्टिव रहें और थक जाएं
आम जनता में डर और अस्थिरता बनी रहे
ईरान को आसमान जीतना जरूरी नहीं है। उसे सिर्फ इतना करना है कि दुश्मन के लिए आसमान की सुरक्षा “महंगी” बना दे।
‘एक बार का हमला’ नहीं, अब ‘लंबी थकाऊ जंग’
पिछले साल की 12 दिन की जंग में ईरान ने बड़े और एक साथ हमले किए थे। इस बार रणनीति अलग है। अब वो लगातार छोटे-छोटे हमले कर रहा है, जिसे एक पूर्व इजरायली अधिकारी ने “ड्रिजल” यानी हल्की लेकिन लगातार बारिश जैसा बताया।
इससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बना रहता है। लोगों को हमेशा शेल्टर के पास रहना पड़ता है और सामान्य जिंदगी प्रभावित होती है।
नागरिक इलाकों को निशाना बनाना
इस बार सिर्फ सैन्य ठिकाने नहीं, बल्कि:
बंदरगाह
एयरपोर्ट
होटल
तेल सुविधाएं
भी निशाने पर हैं।
इससे खाड़ी देशों पर राजनीतिक दबाव बढ़ता है कि वे अमेरिका और इजरायल पर युद्ध रोकने का दबाव डालें।
विदेश मंत्री का बयान
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि कई सैन्य इकाइयों को पहले से सामान्य निर्देश दिए गए हैं और वे स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर रही हैं।
इस बयान का मतलब यह है कि अगर शीर्ष नेतृत्व पर हमला भी हो जाए, तब भी जवाबी कार्रवाई रुकने वाली नहीं है।
क्या है रणनीति?
विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान की सोच यह हो सकती है- सस्ते ड्रोन से लगातार दबाव बनाओ, महंगी मिसाइलों को बाद के लिए बचाकर रखो, दुश्मन की आर्थिक और राजनीतिक ताकत को कमजोर करो और खाड़ी देशों की एकता में दरार डालो।
यह एक “एंड्योरेंस वॉर” यानी सहनशक्ति की जंग बनती जा रही है, जहां जो ज्यादा समय तक टिकेगा, वही आगे रहेगा।
अब आगे क्या?
अमेरिका और खाड़ी देश अब सस्ते ड्रोन से निपटने के लिए सस्ते विकल्प ढूंढ सकते हैं। अगर ईरान को लगे कि उसका लॉन्च सिस्टम खतरे में है, तो वह ज्यादा ताकतवर मिसाइलें इस्तेमाल कर सकता है।
हाल ही में रियाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन हमले ने तनाव और बढ़ा दिया है
ईरान अब बड़े धमाकों की जगह लंबी, थकाने वाली रणनीति पर चल रहा है। सस्ते ड्रोन उसकी इस नई रणनीति की रीढ़ बन गए हैं। यह जंग अब सिर्फ मिसाइलों की नहीं, बल्कि धैर्य, पैसा और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी परीक्षा बनती जा रही है।