शहबाज शरीफ ने ट्रंप को चुकाया 'ऑपरेशन सिंदूर' का एहसान? अमेरिका के लिए मोहरा बना पाकिस्तान
US-Iran War: ट्रंप जानते थे कि पाकिस्तान के ईरान के साथ ठीक-ठाक संबंध हैं। साथ ही, पाकिस्तान की लंबी सीमा भी ईरान से लगती है, जो इस मामले में काम आ सकती है। यह वही ट्रंप हैं, जिन्होंने अपने पहले कार्यकाल में पाकिस्तान पर आरोप लगाया था कि उसने अमेरिका को “झूठ और धोखे” के अलावा कुछ नहीं दिया। लेकिन अब “ट्रंप 2.0” का रवैया पहले से अलग नजर आ रहा है
ईरान से बढ़ते तनाव और अमेरिका के उससे बाहर निकलने की कोशिशों के बीच ट्रंप ने पाकिस्तान पर दबाव डाला
'दुनिया में कभी भी कोई चीज मुफ्त में नहीं मिलती...', ये कहावत आपने भी कई बार सुनी होगी। आज कल के जियो पॉलिटिक्स में भी ये कहावत काफी हद तक सटीक बैठती है। यह बात पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को शायद पिछले साल ही समझ आ गई होगी, जब भारत के साथ तनाव के कुछ हफ्तों बाद उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ बंद कमरे में एक अहम लंच मीटिंग हुई थी।भारत के “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान पाकिस्तान को भारी नुकसान झेलना पड़ा था। उसके कई बड़े सैन्य ठिकानों पर हमले हो रहे थे। ऐसे में पाकिस्तान ने तुरंत अमेरिका से मदद मांगी, जो उस समय दोनों देशों के संपर्क में था। बाद में सीजफायर हुआ, लेकिन यह तब संभव हो पाया जब पाकिस्तान ने सीधे भारत से बातचीत की, जबकि डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को शांति स्थापित कराने वाला बता रहे थे।
अब 8 अप्रैल 2026 की बात करें, तो ऐसा लगता है कि हालात बदल गए हैं। ईरान से जुड़े बढ़ते तनाव और अमेरिका के उससे बाहर निकलने की कोशिशों के बीच ट्रंप ने पाकिस्तान पर दबाव डाला कि वह सीजफायर कराने में मदद करे। इससे यह भी साफ होता है कि ट्रंप के दौर में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते किस तरह आपसी फायदे पर आधारित रहे हैं।
पाकिस्तान...ट्रंप का ‘लाडला’ कैसे बना?
कुछ समय पहले तक पाकिस्तान को अमेरिका का एक भरोसेमंद साथी नहीं माना जाता था। लेकिन पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत के साथ हुए तीन दिन के संघर्ष के बाद, पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में बड़ा बदलाव देखने को मिला। इस बदलाव की एक बड़ी वजह यह रही कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खुलकर तारीफ की। पाकिस्तान ने इस संघर्ष को खत्म कराने का श्रेय भी ट्रंप को दिया। इतना ही नहीं, पाकिस्तान ने ट्रंप का नाम ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ के लिए भी आगे बढ़ाया।
असल में, अमेरिका के आधिकारिक दस्तावेजों से यह सामने आया कि “ऑपरेशन सिंदूर” को रुकवाने के लिए पाकिस्तान कितना बेचैन था। उसने युद्धविराम करवाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप की टीम से 50 से ज्यादा बार संपर्क किया—चाहे वह फोन कॉल हों, ईमेल हों या आमने-सामने की मुलाकातें। इसके बाद अमेरिका ने भारत से बात करके अपनी भूमिका निभाई। तब से पाकिस्तान लगातार ट्रंप को खुश करने की कोशिश कर रहा है। वह हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी जमकर तारीफ करता रहा है। इसका फायदा यह हुआ कि पाकिस्तान की पहले वाली “अलग-थलग” छवि कुछ हद तक सुधरी। साथ ही, उसे क्रिप्टोकरेंसी और खनिज से जुड़े समझौतों में भी लाभ मिला। इतना ही नहीं, पाकिस्तान को ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” में भी शामिल किया गया।
जंग से निकलना चाहते थे ट्रंप!
अब बात ईरान युद्ध की करें, तो हालात पूरी तरह बदल चुके थे। ईरान के साथ युद्ध दूसरे महीने में पहुंच गया था। डोनाल्ड ट्रंप को शुरुआत में लगा था कि ईरान ज्यादा से ज्यादा तीन हफ्तों में हार मान लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान ने मजबूती से जवाब दिया और मध्य-पूर्व में अमेरिकी ठिकानों पर जोरदार हमले किए। युद्ध लंबा खिंचने लगा, खर्च बढ़ता गया और अमेरिका के अंदर भी तनाव बढ़ने लगा। इसी बीच ट्रंप के खिलाफ अमेरिका में काफी तेज आवाजें उठने लगी। ऐसे मुश्किल हालात में फंसे ट्रंप को समझ आ गया कि उन्हें इस स्थिति से निकलने के लिए किसी की मदद चाहिए। यहीं पर पाकिस्तान उनके लिए अहम बन गया।
पाकिस्तान को बनाया मोहरा
ट्रंप जानते थे कि पाकिस्तान के ईरान के साथ ठीक-ठाक संबंध हैं। साथ ही, पाकिस्तान की लंबी सीमा भी ईरान से लगती है, जो इस मामले में काम आ सकती है। यह वही ट्रंप हैं, जिन्होंने अपने पहले कार्यकाल में पाकिस्तान पर आरोप लगाया था कि उसने अमेरिका को “झूठ और धोखे” के अलावा कुछ नहीं दिया। लेकिन अब “ट्रंप 2.0” का रवैया पहले से अलग नजर आ रहा है। द फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, असल में डोनाल्ड ट्रंप ने ही पाकिस्तान पर दबाव डाला था कि वह ईरान के साथ तुरंत सीजफायर करवाने में मध्यस्थता करे। इससे पाकिस्तान का यह दावा कमजोर पड़ गया कि वह इस मामले में पूरी तरह निष्पक्ष है और उसका अपना स्वतंत्र रुख है। इस घटना के बाद पाकिस्तान की भूमिका सिर्फ एक संदेश पहुंचाने वाले देश तक सीमित नजर आई।
वहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की ‘एक्स’ (ट्विटर) पर की गई एक पोस्ट से भी यह साफ हो गया कि इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका कितनी सीमित थी। सीजफायर से कुछ घंटे पहले उनकी पोस्ट का एक शुरुआती ड्राफ्ट सामने आया, जिसमें अमेरिका से ईरान पर हमले रोकने की अपील की गई थी। उसमें में साफ लिखा था—“ड्राफ्ट: एक्स पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का मैसेज।” इससे यह संकेत मिला कि यह मैसेज शायद किसी और देश द्वारा तैयार किया गया था और पाकिस्तान सिर्फ उसे शेयर कर रहा था।
पाक पीएम ने व्हाइट हाउस से मंजूरी
बाद में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के पोस्ट करने से पहले, व्हाइट हाउस ने उसे मंजूरी दे दी थी। हालांकि, यह साफ नहीं हो पाया कि डोनाल्ड ट्रंप खुद इस प्रक्रिया में सीधे शामिल थे या नहीं। पाकिस्तान को इस मामले में शामिल करने के पीछे अमेरिका की सोच काफी सीधी थी। द फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, ट्रंप का मानना था कि अगर सिजफायर का प्रस्ताव किसी मुस्लिम-बहुल पड़ोसी देश की ओर से आएगा, तो ईरान उसे आसानी से मान सकता है। पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान—दोनों से अपने संबंधों का इस्तेमाल करते हुए बैक-चैनल से बातचीत करवाई। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, आसिम मुनीर और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख आसिम मलिक ने फोन पर लगातार बातचीत करके इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
आसिम मुनीर का ट्रंप ने किया ऐसे इस्तेमाल
आसिम मुनीर के रिश्ते न सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप के साथ है बल्कि ईरान की ताकतवर सैन्य संस्था रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के साथ भी उनके पुराने और गहरे रिश्ते थे। असल में, तेहरान में बड़े फैसले लेने में इसी संगठन की अहम भूमिका होती है। ट्रंप यह भी अच्छी तरह जानते थे कि पाकिस्तान के करीबी दोस्त चीन का ईरान पर काफी असर है। इसी वजह से इस रणनीति पर काम किया गया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार हाल ही में चीन गए थे, ताकि उसका समर्थन हासिल किया जा सके। चीन ने आखिर में दखल देकर तेहरान को मनाया और सिजफायर के समझौते को संभव बनाया।