Ladyfinger Crop: भिंडी की खेती में अपनाएं ये तरीका, कम खर्च में ज्यादा मुनाफा

How to grow ladyfinger crop: शाहजहांपुर में किसान फरवरी में भिंडी की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन येलो वेन मोजैक वायरस चिंता का विषय है। विशेषज्ञों के मुताबिक, बीजों को 4–6 घंटे भिगोकर उपचार करें और रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन जरूरी है। सफेद मक्खी से वायरस फैलता है, इसलिए इमिडाक्लोप्रिड या नीम तेल का छिड़काव और संक्रमित पौधों को तुरंत नष्ट करना लाभकारी है, जिससे 80–90% तक नुकसान टाला जा सकता है

अपडेटेड Feb 21, 2026 पर 12:33 PM
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How to grow ladyfinger crop: येलो वेन मोजैक वायरस का मुख्य वाहक सफेद मक्खी है।

फरवरी का महीना भिंडी की गर्मी वाली फसल के लिए बेहद अहम माना जाता है। इस समय किसान बुवाई की तैयारियों में व्यस्त रहते हैं, ताकि अच्छी पैदावार मिल सके। हालांकि, येलो वेन मोजैक वायरस किसानों के लिए बड़ी चिंता बना हुआ है। यह रोग पौधों की बढ़वार को प्रभावित करता है और फल बनने की प्रक्रिया पर भी बुरा असर डालता है। अगर शुरुआत में ही सावधानी नहीं बरती जाए तो उत्पादन में 80 से 90 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर बीज उपचार, रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन और सफेद मक्खी जैसे कीटों पर नियंत्रण बेहद जरूरी है। शुरुआती चरण में की गई सतर्कता ही फसल को सुरक्षित रख सकती है और बेहतर उपज सुनिश्चित कर सकती है।

बीज उपचार है पहली जरूरी कदम


जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक के मुताबिक, बुवाई से पहले बीजों को 4 से 6 घंटे या पूरी रात पानी में भिगोकर रखने से अंकुरण बेहतर होता है। इससे पौधों की शुरुआती वृद्धि मजबूत होती है। साथ ही, पूसा ए-4, अरका अनामिका और परभणी क्रांति जैसी रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन करने से वायरस का खतरा कम हो जाता है।

सफेद मक्खी से फैलता है वायरस

येलो वेन मोजैक वायरस का मुख्य वाहक सफेद मक्खी है। इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मिली प्रति लीटर पानी या अन्य सिस्टेमिक कीटनाशक का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर मोनोक्रोटोफॉस का प्रयोग भी किया जाता है। संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करना जरूरी है।

जैविक उपाय भी हैं असरदार

जो किसान रासायनिक दवाओं से बचना चाहते हैं, वे नीम तेल (4 मिली प्रति लीटर पानी) का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव कर सकते हैं। इससे सफेद मक्खी पर प्रभावी नियंत्रण मिलता है। जैविक तरीका अपनाने से लागत कम होती है और बाजार में बेहतर कीमत भी मिलती है।

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