फरवरी का महीना भिंडी की गर्मी वाली फसल के लिए बेहद अहम माना जाता है। इस समय किसान बुवाई की तैयारियों में व्यस्त रहते हैं, ताकि अच्छी पैदावार मिल सके। हालांकि, येलो वेन मोजैक वायरस किसानों के लिए बड़ी चिंता बना हुआ है। यह रोग पौधों की बढ़वार को प्रभावित करता है और फल बनने की प्रक्रिया पर भी बुरा असर डालता है। अगर शुरुआत में ही सावधानी नहीं बरती जाए तो उत्पादन में 80 से 90 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर बीज उपचार, रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन और सफेद मक्खी जैसे कीटों पर नियंत्रण बेहद जरूरी है। शुरुआती चरण में की गई सतर्कता ही फसल को सुरक्षित रख सकती है और बेहतर उपज सुनिश्चित कर सकती है।
बीज उपचार है पहली जरूरी कदम
जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक के मुताबिक, बुवाई से पहले बीजों को 4 से 6 घंटे या पूरी रात पानी में भिगोकर रखने से अंकुरण बेहतर होता है। इससे पौधों की शुरुआती वृद्धि मजबूत होती है। साथ ही, पूसा ए-4, अरका अनामिका और परभणी क्रांति जैसी रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन करने से वायरस का खतरा कम हो जाता है।
सफेद मक्खी से फैलता है वायरस
येलो वेन मोजैक वायरस का मुख्य वाहक सफेद मक्खी है। इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मिली प्रति लीटर पानी या अन्य सिस्टेमिक कीटनाशक का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर मोनोक्रोटोफॉस का प्रयोग भी किया जाता है। संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करना जरूरी है।
जो किसान रासायनिक दवाओं से बचना चाहते हैं, वे नीम तेल (4 मिली प्रति लीटर पानी) का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव कर सकते हैं। इससे सफेद मक्खी पर प्रभावी नियंत्रण मिलता है। जैविक तरीका अपनाने से लागत कम होती है और बाजार में बेहतर कीमत भी मिलती है।