पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट में रुकावटें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम बनकर उभर रहे हैं। कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतें महंगाई, रुपये और चालू खाते पर दबाव डाल सकती हैं। एएनआई के मुताबिक, यह बात यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट का टाइटल है- From Hormuz to the Rupee: War, Oil and the Global Repricing of Risk। रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट अभी भी व्यावहारिक रूप से बंद है और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है। इसके कारण, मौजूदा हालात वैश्विक या घरेलू आर्थिक संकेतकों और बाजारों के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, 'तेल की ऊंची कीमतें महंगाई के जोखिम को जिंदा रखती हैं, केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में नरमी लाने में देरी कराती हैं, चालू खाते पर दबाव डालती हैं, वित्तीय स्थितियों को सख्त बनाती हैं, और जोखिम वाली संपत्तियों पर बोझ डालती हैं, विशेष रूप से उन अर्थव्यवस्थाओं में जो ऊर्जा का आयात करती हैं।"
यह बात भारत जैसे देशों की संवेदनशीलता को दर्शाती है। भारत अपने कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। पश्चिम एशिया संकट का असर देश के ऊर्जा आयात पर पहले से ही दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि होर्मुज से होने वाली आपूर्ति में रुकावट ने कच्चे तेल की कीमतों को 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचा दिया है, जिसका परिणाम अर्थव्यवस्था पर एक स्पष्ट एनर्जी टैक्स के रूप में सामने आया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, "जैसे-जैसे ईरान-इजरायल संघर्ष बढ़ा, होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली आपूर्ति बाधित हुई और ब्रेंट क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया... इसका परिणाम एक स्पष्ट 'ऊर्जा कर' के रूप में सामने आया। इसके चलते रुपया गिरकर 95 के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया, और चालू खाता घाटा (CAD) व आयातित महंगाई की चिंताओं के कारण शेयर बाजार में गिरावट दर्ज की गई।"
इन वैश्विक विपरीत परिस्थितियों के बीच भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है। डॉलर की वैश्विक मजबूती, शेयर बाजार से पूंजी की रुक-रुककर निकासी और बढ़ी हुई भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं, देश की मजबूत घरेलू आर्थिक बुनियाद पर भारी पड़ीं।
बाजारों को स्थिर करने के लिए RBI ने दिया दखल
इस दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बाजारों को स्थिर करने के लिए हस्तक्षेप किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि केंद्रीय बैंक ने अपनी नीतिगत स्थिति को बनाए रखते हुए, कई उपाय किए हैं, जैसे विदेशी मुद्रा जोखिम पर सख्ती और बाजार में नकदी/लिक्विडिटी सपोर्ट देना। रिपोर्ट के मुताबिक, "RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट को 5.25% पर अपरिवर्तित रखा, और साथ ही अपनी न्यूट्रल नीतिगत स्थिति को दोहराया।" अत्यधिक अस्थिरता की स्थिति में कार्रवाई करने के लिए केंद्रीय बैंक पूरी तरह तैयार है।
बाहरी मोर्चे पर, भारत के व्यापार संतुलन ने कुछ हद तक मजबूती दिखाई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2026 में माल व्यापार घाटा कम होकर 20.7 अरब डॉलर रह गया, जिसमें सोने और ऊर्जा के आयात में कमी का योगदान रहा। हालांकि, जोखिम अभी भी ज्यादा बने हुए हैं।
रुकावटें बनी रहीं तो 100-110 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में रह सकता है ब्रेंट क्रूड
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट में चेतावनी दी कि अगर रुकावटें बनी रहती हैं, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100-110 डॉलर प्रति बैरल की सीमा में बनी रहने की संभावना है। इससे ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम बढ़ जाएगा और खुदरा महंगाई 4% से ऊपर जा सकती है। तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी चालू खाता घाटे को काफी बढ़ा सकती है और महंगाई को और ऊपर ले जा सकती है। आगे रुपये के एक सीमित दायरे में रहने का अनुमान है, लेकिन इसमें कमजोरी का रुझान बना रहेगा।
रिपोर्ट का निष्कर्ष यह रहा कि भारत का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि पश्चिम एशिया संघर्ष पर स्थिति क्या रहेगी। तेल की कीमतें और वैश्विक वित्तीय स्थितियां घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए मुख्य कारक बनी रहेंगी।