ICICI Bank की एक रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती ऊर्जा लागत वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की खुदरा महंगाई दर को 4.5 प्रतिशत तक पहुंचा सकती है। अर्थव्यवस्था नए वेटेज (भार) उपायों के अनुसार खुद को ढाल रही है। बैंक ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के 3.9 प्रतिशत रहने के अपने पहले के अनुमान को बढ़ा दिया है। इसके पीछे वजह है कि पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतें, अन्य सेक्टर्स में हालिया स्थिरता के बावजूद, पिछले सालों की तुलना में उपभोक्ता बास्केट पर अधिक दबाव डाल रही हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में महंगाई को नियंत्रित करने में बड़ी सफलता हासिल की। खुदरा महंगाई दर 2.1% रही। यह आंकड़ा महंगाई के लिए आधिकारिक तौर पर तय की गई सीमा के निचले स्तर पर है। फरवरी 2026 से भारत ने CPI की एक नई सीरीज शुरू की, जिसका बेस ईयर 2024=100 है। पहले यह 2012=100 था।
संशोधित सीरीज की संरचनात्मक बनावट में हुए बदलावों के कारण अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता वैश्विक तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति बढ़ गई है। नई सीरीज के तहत, फूड बास्केट का वेट घटकर 36.8 प्रतिशत रह गया है, जो पुरानी सीरीज की तुलना में 9.1 प्रतिशत की कमी दर्शाता है। वहीं दूसरी ओर पेट्रोल, डीजल और LPG जैसे एनर्जी आइटम्स का भार बढ़ गया है। इसका अर्थ यह है कि अब पेट्रोल की कीमतों में होने वाली किसी भी वृद्धि का प्रभाव पहले की तुलना में दोगुना होगा।
तेल की कीमत 10 डॉलर बढ़ने पर कितनी बढ़ती है महंगाई
ICICI Bank ने सुझाव दिया है कि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 अमेरिकी डॉलर की हर बढ़ोतरी का खुदरा महंगाई दर पर लगभग 40-45 बेसिस पॉइंट्स (bps) का सीधा असर होता है। वहीं कुल असर 50-60 बेसिस पॉइंट्स का पड़ता है। यह बढ़ी हुई संवेदनशीलता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई प्रोडक्ट कैटेगरीज में उपभोक्ता कीमतों में पहले से ही वृद्धि देखी जा रही है।