Justice Yashwant Varma Cash Row: कैश कांड में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने आंतरिक जांच समिति की एक रिपोर्ट को अमान्य करार देने का अनुरोध करने वाली इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा की याचिका गुरुवार (7 अगस्त) को खारिज कर दी। रिपोर्ट में उन्हें कैश बरामदगी मामले में कदाचार का दोषी ठहराया गया है। जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में जांच कमेटी की रिपोर्ट को अमान्य करार देने की मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये याचिका इंटरटेन करने लायक नहीं है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए जी मसीह की पीठ ने कहा कि जस्टिस वर्मा का आचरण विश्वास से परे है और उनकी याचिका पर सुनवाई नहीं की जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि आंतरिक जांच प्रक्रिया और तत्कालीन चीफ जस्टिस द्वारा नियुक्त जजों की समिति ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया था।
रिपोर्ट को प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति को जज वर्मा को हटाने की सिफारिश के साथ भेजना असंवैधानिक नहीं था। साथ ही न्यायालय ने किसी भी न्यायिक कदाचार पर कार्रवाई करने के CJI के अधिकार का समर्थन करते हुए कहा था कि वह महज एक डाकघर नहीं हो सकते। बल्कि राष्ट्र के प्रति उनके कुछ कर्तव्य हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि घटना के समय का वीडियो अपलोड करने का तत्कालीन CJI जस्टिस संजीव खन्ना का फैसला सही नहीं था, लेकिन इसे समय रहते चुनौती नहीं दी गई। इस फैसले से संसद के लिए जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही तेज करने का रास्ता साफ हो गया है। उन्होंने तत्कालीन चीफ जस्टिस द्वारा राष्ट्रपति को उन्हें हटाने की सिफारिश को भी चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि आंतरिक समिति को किसी जज को हटाने की सिफारिश करने का अधिकार नहीं है। इसका दायरा केवल चीफ जस्टिस को सलाह देने तक सीमित है। सिब्बल ने कहा कि इस तरह के कदम से एक असंवैधानिक व्यवस्था का निर्माण होगा।
इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा, "हमने कहा है कि इस प्रक्रिया को कानूनी मान्यता प्राप्त है। हमने यह भी माना है कि यह कोई समानांतर और संविधान-असंवैधानिक व्यवस्था नहीं है।" 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में आग लगने के बाद लगभग डेढ़ फुट से ज्यादा कैश के ढेर मिले। उस समय जज अपने आवास पर नहीं थे।
मामले की जांच कर रही समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों का उस स्टोर रूम पर किसी न किसी तरह से नियंत्रण था, जहां आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में नोटों की अधजली गड्डियां मिली थीं। समिति ने कहा कि इससे जस्टिस वर्मा का कदाचार साबित होता है और यह इतना गंभीर है कि उन्हें पद से हटाया जाना चाहिए।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता वाली तीन जजों की समिति ने 10 दिन तक जांच की, 55 गवाहों से पूछताछ की। जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर उस स्थान का दौरा किया, जहां 14 मार्च को रात करीब 11:35 बजे आग लगी थी। घटना के समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे। फिलहाल वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज हैं।