Kerala Election 2026: जिन सीटों पर बीजेपी को मिला 20% वोट, उन पर LDF ने मारी बाजी! केरल में किसके खिलाफ लड़ रही है भाजपा?

हाल के वर्षों में भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती मौजूदगी ने राज्य में एक ऐसा 'त्रिकोणीय' समीकरण पैदा कर दिया है, जिसका सबसे बड़ा फायदा और सीधा फायदा LDF को मिलता दिख रहा है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर केरल में BJP किसके खिलाफ लड़ रही है? तो आइए आंकड़ों और चुनावी रणनीतियों के आधार पर इस 'पॉलिटिकल शिफ्ट' को विस्तार से समझाते है

अपडेटेड Apr 09, 2026 पर 2:32 PM
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Kerala Election 2026: जिन सीटों पर बीजेपी को मिला 20% वोट, उन पर LDF ने मारी बाजी! केरल में किसके खिलाफ लड़ रही है भाजपा?

"भगवान का अपना देश" (God's Own Country) कहे जाने वाले दक्षिण राज्य केरल में गुरुवार को 140 विधानसभा सीटों पर चुनाव के लिए वोटिंग हो रही है, जिसके नतीजे 4 मई को आएंगे। केरल की राजनीति में दशकों तक मुकाबला केवल लेफ्ट गठबंधन- LDF और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन- UDF के बीच रहा है। इस लड़ाई में पिछले कुछ सालों से BJP की भी एंट्री हो गई है। LDF और UDF दोनों ही एक दूसरे पर ये आरोप लगाते आए हैं कि उनमें बीजेपी से लड़ने की हिम्मत नहीं है या फिर वे बीजेपी के साथ मिलीभगत कर रहे हैं।

लेकिन आंकड़े कुछ और ही बयां कर रहे हैं। हाल के वर्षों में भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती मौजूदगी ने राज्य में एक ऐसा 'त्रिकोणीय' समीकरण पैदा कर दिया है, जिसका सबसे बड़ा फायदा और सीधा फायदा LDF को मिलता दिख रहा है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर केरल में BJP किसके खिलाफ लड़ रही है? तो आइए आंकड़ों और चुनावी रणनीतियों के आधार पर इस 'पॉलिटिकल शिफ्ट' को विस्तार से समझाते है।

जहां BJP को बढ़त, वहां LDF की जीत!


Vote Vibe India के फाउंडर अमिताभ तिवारी के विशलेषण मुताबिक, केरल के पिछले दो विधानसभा चुनावों (2016 और 2021) के आंकड़े एक साफ पैटर्न दिखाते हैं। बीजेपी जहां भी मजबूत होती है, वहां कांग्रेस के UDF गठबंधन को तो सबसे ज्यादा नुकसान होता ही है, लेकिन वामपंथी गठबंधन यानी LDF बाजी मार ले जाता है।

2016 का परिणाम: बीजेपी ने केरल 20 सीटों पर 20% से ज्यादा वोट हासिल किए। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF का हिंदू वोट बैंक बुरी तरह बिखर गया और LDF ने उन सभी 20 सीटों पर कब्जा कर लिया।

2021 का परिणाम: बीजेपी का प्रभाव और बढ़ा और वह 25 सीटों पर 20% से ज्यादा वोट ले आई। इस बार भी LDF ने इनमें से 22 सीटें जीतीं। यह साफ दिखाता है कि बीजेपी की मौजूदगी कांग्रेस के लिए तो 'चुनावी काल' साबित हो रही है, लेकिन LDF को इसका सीधा फायदा हो रहा है।

2021 में तिरुवनंतपुरम विधानसभा चुनाव के नतीजे भी इस बात की तस्दीक करते हैं। इस सीट पर BJP के कृष्णकुमार जी को 27.5% वोट मिले और जीत की माला LDF के उम्मीदवार एंटनी राजू के गले में पड़ी। उन्होंने 7089 वोटों के अंतर से कांग्रेस के वीएस शिवकुमार को हरा दिया।

कंजिरापल्ली विधानसभा सीट पर भी कुछ ऐसे ही नतीजे देखने को मिले, जहां BJP के अल्फोंस कन्ननथनम को 21.3% वोट मिले, लेकिन जीत LDF के घटक दल केरल कांग्रेस (एम)  के उम्मीदवार डॉ. एन जयराज की हुई। जयराज ने कांग्रेस के जोसेफ वाझक्कन को 13,703 वोटों के अंतर से हराया।

हिंदू वोटों का बंटवारा!

राज्य की सांप्रदायिक आबादी बीजेपी के लिए सबसे बड़ी रुकावट है।

2011 की जनगणना के अनुसार, केरल में 54.7% हिंदू, 26.6% मुस्लिम और 18.4% ईसाई हैं। ये ईसाई भी कई अलग-अलग संप्रदायों में बंटे हुए हैं। बीजेपी राज्य में अपनी जगह बनाने के लिए ईसाइयों और मुसलमानों के बीच दिख रहे तनाव पर भरोसा कर रही है।

परंपरागत रूप से केरल का हिंदू वोट बैंक (खासकर नायर और उच्च जाति के हिंदू) UDF का समर्थन करता रहा है। बीजेपी ने इसी वोट बैंक में सबसे बड़ी सेंध लगाई है।

जब कांग्रेस का हिंदू वोटर बीजेपी की ओर जाता है, तो कांग्रेस का आधार छोटा हो जाता है।

इसके उलट, LDF का अपना एक समर्पित 'कैडर वोट' है, जो स्थिर रहता है। इस तरह विपक्षी वोटों के बंटवारे के कारण LDF कम मार्जिन से भी सीटें जीत लेती है।

2021 में पिनारायी विजयन को राज्य में हुए सामाजिक बदलावों का फायदा मिला।

CPI(M) ने हिंदू वोटरों का जो नुकसान बीजेपी की तरफ हुआ था, उसे दक्षिणी जिलों में ईसाइयों और मुसलमानों के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़कर पूरा कर लिया।

इसी वजह से पार्टी को लगातार दूसरी बार सत्ता में आने का अनोखा मौका मिल गया। अब विजयन और LDF अपने पारंपरिक हिंदू वोटों को फिर से एकजुट करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

अल्पसंख्यकों का 'सुरक्षा' ध्रुवीकरण

केरल में लगभग 45% आबादी अल्पसंख्यक (मुस्लिम और ईसाई) है। जब बीजेपी की ताकत बढ़ती है, तो इन समुदायों में असुरक्षा का भाव पैदा होता है।

ऐसे में अल्पसंख्यक समुदाय उस पार्टी की ओर झुकता है, जो BJP के खिलाफ सबसे 'मजबूत दीवार' की तरह खड़ी दिखे।

LDF ने अपनी छवि एक ऐसी पार्टी के रूप में बनाई है, जो विचारधारा के स्तर पर BJP से कभी समझौता नहीं करती। 2021 में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक मतदाताओं ने कांग्रेस के बजाय LDF को चुना, ताकि बीजेपी को सत्ता से दूर रखा जा सके।

त्रिकोणीय मुकाबले का गणित

जब मुकाबला त्रिकोणीय होता है, तो जीतने के लिए जरूरी वोट शेयर का प्रतिशत गिर जाता है। LDF का 35-40% का स्थिर वोट बैंक उन्हें उन सीटों पर अजेय बना देता है, जहां बीजेपी 20% से ज्यादा वोट लेकर कांग्रेस के वोट बैंक को खोखला कर देती है।

तीनों गठबंधनों (LDF, UDF और BJP) के बीच समुदायों का आपस में उलझाव होने की वजह से चुनावी नतीजे की संख्या का अंदाजा लगाना काफी मुश्किल है।

LDF और UDF दोनों के कुछ वोटर बीजेपी की तरफ जा रहे थे, जबकि LDF को UDF से भी कुछ वोट मिल रहे थे।

लोकसभा चुनाव में दिखा एक अलग ट्रेंड

भले ही अब तक BJP की बढ़त ने LDF की मदद की है, लेकिन हालिया 2024 के लोकसभा चुनावों ने एक नया मोड़ दिया है।

2024 में बीजेपी ने तृश्शूर सीट जीती, जहां उन्होंने न केवल कांग्रेस बल्कि LDF के भी 'ईझावा' (OBC) वोटों में सेंध लगाई। इसका मतलब है कि अब बीजेपी केवल 'वोट काटने वाली' पार्टी नहीं रही, बल्कि वह सीधे तौर पर चुनाव जीतने की क्षमता विकसित कर रही है।

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