West Bengal Election 2026: सड़क पर संघर्ष से सत्ता के शिखर तक, ममता बनर्जी के बंगाल की 'दीदी' बनने तक का सफर

Bengal Election 2026: विशेषज्ञों का मानना है कि ममता की असली ताकत स्थानीय मुद्दों को बड़ा आंदोलन बनाने में है। सिंगूर और नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हुए प्रदर्शन उनके करियर के टर्निंग पॉइंट रहे। 2011 में उन्होंने वामपंथियों के 34 साल पुराने किले को ढहा दिया, जिसे कभी नामुमकिन माना जाता था

अपडेटेड Mar 31, 2026 पर 1:40 PM
Story continues below Advertisement
West Bengal Election 2026: सड़क पर संघर्ष से सत्ता के शिखर तक, ममता बनर्जी बंगाल की 'दीदी' बनने तक का सफर

सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल- ममता बनर्जी की यह सादगी भरी पहचान भारतीय राजनीति में उन्हें सबसे अलग खड़ा करती है। दशकों के संघर्ष के बाद, 'दीदी' के नाम से मशहूर ममता आज पश्चिम बंगाल की निर्विवाद नेता और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का एक मजबूत चेहरा बन चुकी हैं।

CNN-News18 के मुताबिक, राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं, "ममता एक दुर्लभ उदाहरण हैं, जिन्होंने बिना किसी संस्थागत समर्थन के, सिर्फ सड़क पर उतरकर जन-आंदोलनों के दम पर अपनी सत्ता खड़ी की है।"

सड़क की ताकत से सत्ता का केंद्र तक


ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी। उस दौर में जब पश्चिम बंगाल में वामपंथी मोर्चे (Left Front) का दबदबा था, ममता अकेली ऐसी नेता थीं, जो उनसे टकराने का साहस रखती थीं। 1998 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाना उनके जीवन का सबसे बड़ा जुआ था, जिसने बंगाल की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि ममता की असली ताकत स्थानीय मुद्दों को बड़ा आंदोलन बनाने में है। सिंगूर और नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हुए प्रदर्शन उनके करियर के टर्निंग पॉइंट रहे। 2011 में उन्होंने वामपंथियों के 34 साल पुराने किले को ढहा दिया, जिसे कभी नामुमकिन माना जाता था।

'दीदी' की छवि और सादगी की राजनीति

ममता की राजनीति के केंद्र में उनकी "दीदी" वाली छवि है। उन्होंने जनता के साथ एक सीधा भावनात्मक रिश्ता जोड़ा है। उनकी सादगी कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीति है।

विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता के अनुसार, "उनकी सादगी ही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है, जो उन्हें रईस और एलीट नेताओं से अलग बनाता है।" हालांकि, उनके विरोधी उन पर सत्ता को अपने हाथ में केंद्रित रखने का आरोप भी लगाते हैं।

कल्याणकारी योजनाएं और पहचान की राजनीति

ममता सरकार का मॉडल 'वेलफेयर' यानी जन-कल्याण पर टिका है। महिलाओं, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण गरीबों के लिए शुरू की गई योजनाओं ने उन्हें एक वफादार वोट बैंक दिया है।

राजनीतिक वैज्ञानिक मिलन वैष्णव इसे 'डिलीवरी प्लस आइडेंटिटी' का मेल बताते हैं। इसी मॉडल के दम पर उन्होंने 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी घेराबंदी के बावजूद बड़ी जीत दर्ज की थी।

विवाद और चुनौतियां

ममता का शासनकाल विवादों से भी घिरा रहा है। उनकी सरकार को भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा है, खासकर स्कूल भर्ती घोटाला, जिसमें उनके करीबी मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी हुई। इसके अलावा:

कानून व्यवस्था: बीरभूम हिंसा, चुनाव के बाद की हिंसा और हालिया आरजी कर अस्पताल मामला उनके प्रशासन पर सवाल खड़े करते हैं।

विरोध को दबाना: विपक्ष और नागरिक समाज उन पर असहमति की आवाज को दबाने और डराने-धमकाने का भी आरोप लगाते रहे हैं।

राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और 2026 की राह

आज ममता बनर्जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे मुखर आलोचकों में से एक हैं। हालांकि, बंगाल के बाहर पार्टी का विस्तार करने में उन्हें अभी तक खास सफलता नहीं मिली है, लेकिन वह विपक्षी एकजुटता की धुरी बनी हुई हैं।

2026 का चुनाव: सबसे बड़ी परीक्षा

पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव ममता के लिए 'अग्निपरीक्षा' जैसे होंगे। 15 साल के शासन के बाद उन्हें सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency), भ्रष्टाचार के आरोपों और भाजपा की नई चुनौतियों का सामना करना है।

मिलन वैष्णव के अनुसार, "2026 का चुनाव यह तय करेगा कि ममता का मॉडल कितना टिकाऊ है। अगर वह फिर से जीतती हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद और बढ़ेगा, वरना उनकी ताकत केवल बंगाल तक ही सीमित रह जाएगी।"

West Bengal Election: 'BJP के लोगों को मछली, मांस और अंडा से... ' ममता बनर्जी का जोरदार हमला

हिंदी में शेयर बाजार स्टॉक मार्केट न्यूज़,  बिजनेस न्यूज़,  पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App  डाउनलोड करें।