बारामती, जो पवार परिवार का गढ़ माना जाता है और जहां से शरद पवार के प्रभाव में अजित पवार का राजनीतिक सफर शुरू हुआ, वही शहर बुधवार को उनके जीवन का अंतिम पड़ाव भी बना। विमान हादसे में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का निधन बारामती में ही हुआ। यह एक गहरी विडंबना है कि जिस क्षेत्र ने उन्हें बड़ा राजनीतिक नेता बनाया, वही उनकी आखिरी कहानी का गवाह भी बना।
कई दशकों तक बारामती का नाम पवार परिवार से जुड़ा रहा। 1967 से यह सीट परिवार के पास रही- पहले शरद पवार और फिर 1991 के बाद अजित पवार के पास। अजित पवार ने राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से की थी और 1999 में NCP बनने के बाद वे उस पार्टी में शामिल हुए। बारामती में उनका जमीनी स्तर पर किया गया काम उनकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह बना और समय के साथ उन्होंने मजबूत जनसमर्थन तैयार किया।
2024 में कड़ी परीक्षा से गुजरा बारामती
यह समर्थन नवंबर 2024 में कड़ी परीक्षा से गुजरा। बारामती के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ, जब शरद पवार की बात अंतिम नहीं रही। मतदाताओं ने अजित पवार को उनके भतीजे युगेंद्र पवार (NCP-SP उम्मीदवार) के खिलाफ 1,00,899 वोटों से बड़ी जीत दिलाई।
इस नतीजे ने 2023 में हुए NCP विभाजन के बाद बारामती की सियासी लड़ाई को लगभग तय कर दिया। चुनाव प्रचार बेहद व्यक्तिगत हो गया था। शरद पवार गुट ने इसे विश्वासघात बताया, जबकि अजित पवार गुट ने परिवार से दूरी की बात कही। जीत के बाद अजित पवार की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार ने कहा, “बारामती के लोगों ने साबित कर दिया कि वही दादा का असली परिवार हैं।”
बारामती में परिवार और राजनीति का टकराव इससे पहले भी दिखा था। लोकसभा चुनाव में अजित पवार ने अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के खिलाफ उतारा था। उस चुनाव में सुप्रिया सुले की जीत हुई, जिसके बाद अजित पवार ने कहा था कि वे बारामती से दोबारा चुनाव नहीं लड़ेंगे। लेकिन बाद में उन्होंने फैसला बदला और फिर से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। समर्थकों ने इस जीत का श्रेय लगभग चार दशकों के विकास कार्यों को दिया।
जमीन से जुड़े नेता के रूप में पहचाने गए अजित 'दादा'
22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले के राहुरी तालुका के देवलाली प्रवरा में जन्मे अजित पवार लोगों से लगातार जुड़े रहने और जमीन से जुड़े नेता के रूप में पहचाने गए। इसी कारण वे “अजित दादा” कहलाए। चुनावी राजनीति के अलावा उन्होंने मिल्क यूनियन, चीनी मिलों और बैंकों जैसी सहकारी संस्थाओं में भी अहम भूमिका निभाई, जो महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति की रीढ़ मानी जाती हैं।
उनका औपचारिक नेतृत्व सफर 1991 में शुरू हुआ, जब वे बारामती से लोकसभा सांसद चुने गए। बाद में उन्होंने यह सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए खाली की। इसके बाद अजित पवार बारामती से सात बार विधानसभा सदस्य चुने गए- 1991 के उपचुनाव में और फिर 1995, 1999, 2004, 2009 और 2014 में। उन्होंने कई अहम मंत्रालय संभाले और उपमुख्यमंत्री जैसे बड़े पद पर भी रहे।
सबसे बढ़कर, अजित पवार ने बारामती को सिर्फ चुनावी तौर पर नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से भी जीत लिया। अपने चाचा के समर्थित उम्मीदवार और अपने ही भतीजे को 1,00,000 से ज्यादा वोटों से हराकर उन्होंने खुद को इस क्षेत्र की सबसे ताकतवर राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित किया।
बुधवार को वही बारामती, जिसने उनके राजनीतिक सफर को आकार दिया, उनके निधन का गवाह बना। जहां अजित पवार ने अपनी पहचान बनाई, वहीं उनकी जीवन यात्रा पूरी हुई- महाराष्ट्र की राजनीति के इतिहास में यह एक भावुक और यादगार अंत है।