SIR Row in Bengal: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (2 अप्रैल) को मालदा में सात न्यायिक अधिकारियों को करीब 9 घंटे तक बंधक बनाए जाने को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार और प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने इस घटना को पहले से प्लान की गई, सोची-समझी और मकसद वाली कोशिश बताया। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में हुए उन विरोध प्रदर्शनों का गंभीर संज्ञान लिया है जिनमें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया में शामिल न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची एवं जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने चुनाव आयोग (ECI) को इस घटना की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) या राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से कराए जाने का अनुरोध करने की अनुमति दी।
'बंगाल में कानून-व्यवस्था ध्वस्त'
CJI ने कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था तंत्र ध्वस्त हो गया है। उन्होंने इस मामले में कार्रवाई में देरी को लेकर राज्य के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई। चीफ जस्टिस ने कहा कि मालदा जिले में तीन महिलाओं समेत सात न्यायिक अधिकारियों को असामाजिक तत्वों ने बंधक बना लिया था। उन्होंने कहा कि बुधवार देर रात तक उन्हें खुद स्थिति पर नजर रखनी पड़ी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि मालदा जिले में तीन महिलाओं सहित सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की घटना निंदनीय है। अदालत ने कहा कि यह घटना न केवल न्यायिक अधिकारियों को धमकाने का एक दुस्साहसी प्रयास है। बल्कि यह न्यायालय के अधिकारी को भी चुनौती देती है।
'किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत नहीं'
CJI ने कहा, "यह न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने और चुनावी प्रक्रिया को रोकने के लिए एक सोचा-समझा एवं निहित स्वार्थों से प्रेरित कदम प्रतीत होता है।" सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह न्यायिक अधिकारियों पर मनोवैज्ञानिक हमले के लिए किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने और हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देगा।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि यह पश्चिम बंगाल सरकार और अधिकारियों द्वारा कर्तव्य का पालन नहीं किए जाने का भी मामला है। उन्हें अपनी निष्क्रियता के कारण बताने होंगे। इसी के सात सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को मालदा में सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना की CBI या NIA जांच कराने का अनुरोध करने की अनुमति दे दी।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया में देरी पर उठाए सवाल
घटनाओं के क्रम का ब्योरा देते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि घेराव बुधवार दोपहर करीब 3:30 बजे शुरू हुआ। इसके बाद रजिस्ट्रार जनरल ने प्रशासनिक अधिकारियों को सूचना दी और तुरंत दखल देने की मांग की। लेकिन, कई घंटों तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।
CJI ने कहा, "रात 8:30 बजे तक कुछ नहीं किया गया। फिर गृह सचिव से संपर्क किया गया। साथ ही DGP को हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के साथ एक ग्रुप कॉल पर लिया गया। जल्द कार्रवाई का भरोसा दिया गया। लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।"
कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी जिले के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर नहीं पहुंच पाए। शीर्ष अदालत ने आगे कहा, "न तो जिलाधिकारी और न ही पुलिस अधीक्षक वहां पहुंचे। चीफ जस्टिस को खुद DGP और गृह सचिव को फोन करना पड़ा।"
शीर्ष अधिकारियों का रवैया 'निंदनीय'
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव सहित राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के रवैये की कड़ी आलोचना की। CJI ने कहा, "मुख्य सचिव, DGP और गृह सचिव का रवैया निंदनीय है।" कोर्ट ने इस मुद्दे के राजनीतिकरण पर भी सवाल उठाया। साथ ही पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल को संबोधित करते हुए कहा, "दुर्भाग्य से आपके राज्य में हर कोई राजनीतिक तौर पर बात करता है। हमें पता है कि उपद्रवी कौन हैं।"