Allahabad High Court: क्या दो अलग-अलग धर्मों के लोग लिव-इन में रह सकते हैं? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किया साफ
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अदालत अलग-अलग धर्म के कपल को हिंदू और मुसलमान के रूप में नहीं, बल्कि दो बालिग व्यक्तियों के रूप में देखता है, जो साथ में खुशी से रह रहे हैं। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले इंटरफेथ कपल की रक्षा करता है।
क्या दो अलग-अलग धर्मों के लोग लिव-इन में रह सकते हैं? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किया साफ
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अदालत अलग-अलग धर्म के कपल (Interfaith Couple) को हिंदू और मुसलमान के रूप में नहीं, बल्कि दो बालिग व्यक्तियों के रूप में देखता है, जो साथ में खुशी से रह रहे हैं। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले इंटरफेथ कपल की रक्षा करता है।
जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ एक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे इंटरफेथ कपल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कपल ने कहा था कि उन्हें अपनी सुरक्षा का डर है और पुलिस ने उनकी चिंताओं पर कोई ध्यान नहीं दिया। इसी वजह से उन्होंने कोर्ट में याचिका दाखिल की।
कोर्ट ने 18 मार्च के अपने आदेश में कहा कि सरकार के वकील ने कहा है कि इंटरफेथ कपल के एक साथ रहने के संबंध में कोई FIR दर्ज नहीं की गई है।
अदालत कपल को हिंदू और मुसलमान के रूप में नहीं देखता
याचिका का निपटारा करते हुए जज ने कहा, "यह अदालत याचिकाकर्ताओं को, जो अलग-अलग धर्मों के हैं, हिंदू और मुसलमान के रूप में नहीं देखता, बल्कि दो वयस्क व्यक्तियों के रूप में देखता है जो अपनी स्वतंत्र इच्छा और पसंद से काफी समय से शांतिपूर्वक और खुशी से एक साथ रह रहे हैं।"
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “धर्म की परवाह किए बिना, अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न अंग है। व्यक्तिगत संबंधों में हस्तक्षेप दो व्यक्तियों की पसंद की स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा।
कानून एक साथ रहने की देता है इजाजत
कोर्ट ने कहा कि जब कानून दो लोगों (यहां तक कि एक ही लिंग के लोगों) को साथ रहने की इजाजत देता है, तो फिर कोई व्यक्ति, परिवार या यहां तक कि राज्य भी दो बालिग लोगों के आपसी सहमति से साथ रहने पर आपत्ति नहीं कर सकता।
कोर्ट ने आगे कहा, बालिग व्यक्ति द्वारा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का निर्णय पूरी तरह से एक व्यक्ति का अधिकार है और जब इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो यह उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा, क्योंकि इसमें साथी चुनने की स्वतंत्रता और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार शामिल है।”
कोर्ट ने कहा कि हर नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।
कोर्ट ने आदेश में कहा, “नागरिक के धार्मिक विश्वासों की परवाह किए बिना, मानव जीवन के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता अंतरधार्मिक संबंध में रह रहे हैं, उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे भारत के नागरिक हैं।"
इलाहाबाद हाई कोर्ट लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले विवाहित लोगों के विषय पर अपने दो अलग-अलग फैसलों के कारण चर्चा में रही है।
तलाक लिए बिना तीसरे व्यक्ति के साथ गैर कानूनी
एक फैसले में, न्यायाधीश विवेक कुमार सिंह की एकल-न्यायाधीश पीठ ने कहा कि एक विवाहित व्यक्ति अपने जीवनसाथी से तलाक लिए बिना किसी तीसरे व्यक्ति के साथ कानूनी रूप से लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकता। कोर्ट ने कहा कि "एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जाती है जहां दूसरे व्यक्ति का वैधानिक अधिकार शुरू होता है"।
कोर्ट ने कहा कि पति या पत्नी को अपने साथी के साथ समय बिताने का अधिकार है, और साथी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर उसे इससे वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे मामलों में लिव-इन कपल को सुरक्षा प्रदान करने के लिए अधिकारियों को निर्देश नहीं दे सकता।
एक अन्य मामले में, न्यायाधीश जे.जे. मुनीर और न्यायाधीश तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि एक विवाहित पुरुष का किसी वयस्क महिला के साथ सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कानून के तहत अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि "सामाजिक राय और नैतिकता" इस मामले में कोर्ट का मार्गदर्शन नहीं करेंगी।