Gujarat News: गुजरात के चिड़ियाघरों में भैंसों को मारने के खिलाफ याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
Gujarat News: 29 जनवरी को गुजरात हाई कोर्ट ने एक NGO की तरफ से दायर जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया था। इस याचिका में जूनागढ़ के 'सक्करबाग जूलॉजिकल पार्क' परिसर के अंदर टेंडर प्रक्रिया के जरिए नियुक्त एक ठेकेदार द्वारा भैंसों को संभालने और उन्हें मारने के तरीके को चुनौती दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने इनकार कर दिया है
Gujarat News: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुजरात के चिड़ियाघरों में भैंसों को मारने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी
Gujarat News: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (18 मई) को गुजरात हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें भैंसों को मारने से जुड़े एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया गया था। इस PIL में गुजरात के दो चिड़ियाघरों के अंदर जंगली जानवरों को खिलाने के लिए भैंसों को मारे जाने को चुनौती दी गई थी। शीर्ष अदालत ने दोनों चिड़ियाघरों में जंगली जानवरों को खिलाने के लिए भैंसों की हत्या के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने इस प्रथा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि जानवरों को किसी भी कमर्शियल या निजी मकसद से नहीं मारा जा रहा था। पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जिन नियमों का हवाला दिया जा रहा है, वे मुख्य रूप से मानव उपभोग के लिए संचालित बूचड़खानों पर लागू होते हैं।
क्या है पूरा मामला?
अदालत की यह टिप्पणी तब सामने आई जब याचिकाकर्ता NGO 'एनिमल वेलफेयर फाउंडेशन' ने दलील दी कि चिड़ियाघर के अंदर जानवरों को मारना एक बूचड़खाना चलाने जैसा है। इसके लिए कानूनों का पालन करना जरूरी है। जस्टिस मेहता ने कहा, "नियमों का यह पूरा पुलिंदा उन बूचड़खानों के लिए है, जहां जानवरों को इंसानों के खाने या कमर्शियल मकसद से मारा जाता है। उन्हें चिड़ियाघर का मैनेजमेंट अपनी मर्जी से करने दें।"
याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील निखिल गोयल ने दलील दी कि चिड़ियाघर के अंदर जानवरों को मारे जाने पर रेगुलेशन लागू होना चाहिए। भले ही यह कमर्शियल मकसद से न किया जा रहा हो। उन्होंने कहा, "चिड़ियाघर के अंदर किसी भी जानवर को मारे जाने पर रेगुलेशन लागू होना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि यह गैर-कमर्शियल मकसद से किया जा रहा है। रेगुलेशन खत्म नहीं हो जाते। देश में कहीं भी इस तरह का तरीका नहीं अपनाया जाता।"
इस पर पीठ ने कहा, "उन्हें चिड़ियाघर जैसे चलाना है चलाने दीजिए। वास्तव में आपको तो यह कहते हुए PIL दाखिल करनी चाहिए थी कि चिड़ियाघर ही हटा दिए जाएं, क्योंकि वह भी जानवरों के प्रति क्रूरता है।" गोयल ने सुप्रीम कोर्ट के 2017 के 'कॉमन कॉज बनाम भारत संघ' मामले के फैसले का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि उस मामले में दिए गए निर्देशों के मुताबिक, सरकार ने जानवरों को मारे जाने से पहले, मारे जाने के दौरान और मारे जाने के बाद के चरणों को कंट्रोल करने वाले 24 रेगुलेशन की पहचान की थी। उन्होंने दलील दी कि उन 24 रेगुलेशन में से सिर्फ एक रेगुलेशन शायद लागू न हो, क्योंकि मांस इंसानों के खाने के लिए नहीं था। लेकिन बाकी रेगुलेशन फिर भी लागू होंगे।
याचिकाकर्ता की दलील
सीनियर वकील निखिल गोयल ने कहा कि भारत के दूसरे चिड़ियाघरों के उलट, जहां प्रोसेस्ड मांस या खाने की सप्लाई के लिए टेंडर जारी किए जाते हैं। गुजरात के दो चिड़ियाघरों में जिंदा भैंसों को चिड़ियाघर के अंदर लाने और वहां कैद जंगली जानवरों को खिलाने के लिए उन्हें मारने की इजाजत दी जाती है।
उन्होंने कहा, "जब किसी जानवर को मारा जाता है, तो उससे प्रदूषण फैलता है, पानी पर भी असर पड़ता है... गुजरात राज्य में सिर्फ इन दो चिड़ियाघरों में ही जिंदा जानवरों को अंदर लाने, चिड़ियाघर के अंदर ही उन्हें मारने, फिर उनके खाने लायक हिस्से का इस्तेमाल करने और बाकी हिस्से को बाहर ले जाने की इजाजत दी जाती है।"
वकील ने दलील दी कि चिड़ियाघर परिसर के अंदर जानवरों को मारना एक बूचड़खाना चलाने जैसा है। इसलिए इसके लिए कानूनों का पालन करना जरूरी है, जिसमें 'जानवरों के प्रति क्रूरता की रोकथाम अधिनियम' और लाइसेंस से जुड़ी शर्तें शामिल हैं। इस पर जस्टिस नाथ ने कहा कि अदालत इस दलील से सहमत नहीं है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
29 जनवरी को गुजरात हाई कोर्ट ने एक NGO की तरफ से दायर जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। इस याचिका में जूनागढ़ के 'सक्करबाग जूलॉजिकल पार्क' परिसर के अंदर टेंडर प्रक्रिया के जरिए नियुक्त एक ठेकेदार द्वारा भैंसों को संभालने और उन्हें मारने के तरीके को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि चिड़ियाघर के अंदर कोई मान्यता प्राप्त बूचड़खाना नहीं है। जानवरों को बिना किसी अनुमति के और बिना किसी नियम-कानून के मारा जा रहा है। हाई कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि चिड़ियाघर के अधिकारियों ने एक कानूनी नोटिस का जवाब देते हुए कहा था कि चिड़ियाघर 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण' द्वारा बनाए गए नियमों के तहत काम करता है।
चिड़ियाघर के अधिकारियों ने हाई कोर्ट के सामने यह भी कहा कि 'खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011' इस मामले पर लागू नहीं होते। उन्होंने तर्क दिया कि यह मांस इंसानों के खाने के लिए या व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए नहीं था। हाई कोर्ट ने भी कहा था कि मांस मानव उपभोग के लिए नहीं बल्कि जंगली जानवरों के भोजन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।