Justice Sharma Vs Kejriwal: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल को दिया तगड़ा झटका, वे 10 कारण जिनकी वजह से खारिज हो गई याचिका
Justice Sharma Vs Arvind Kejriwal: दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख और पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया। एक घंटे से अधिक समय तक हुई सुनवाई में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि किसी भी वादी को बिना किसी सबूत के जज पर फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है
Justice Sharma Vs Arvind Kejriwal: शराब नीति मामले में दिल्ली हाई कोर्ट से अरविंद केजरीवाल को झटका लगा है
Justice Sharma Vs Arvind Kejriwal: दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सोमवार (20 अप्रैल) को आबकारी नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल एवं अन्य लोगों की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया। एक घंटे से अधिक समय तक हुई सुनवाई में जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी भी वादी को बिना किसी सबूत के जज पर फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि जज किसी वादी के पूर्वाग्रह के निराधार डर को दूर करने के लिए खुद को मामले से अलग नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक नेता को बिना किसी आधार के किसी संस्था को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि किसी जज पर व्यक्तिगत हमला न्यायपालिका पर ही हमला होता है।
जस्टिस शर्मा ने निष्कर्ष निकाला कि उन्हें हटाने की याचिकाओं में दर्ज डिटेल्स अनुमानों और कथित झुकावों पर आधारित था। जज ने आगे कहा, "यह अदालत अपने और संस्था के लिए खड़ी रहेगी... मैं खुद को इस मामले से अलग नहीं करूंगी।" अरविंद केजरीवाल के अलावा, आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने भी जज को मामले से अलग करने के लिए आवेदन दायर किए थे।
केजरीवाल ने जज पर उठाए थे सवाल
केजरीवाल ने आबकारी नीति मामले में अपनी रिहाई के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की याचिका की सुनवाई कर रही जज के खिलाफ कई आपत्तियां उठाई थीं। इनमें यह भी शामिल था कि उन्होंने पहले उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया था। साथ ही मनीष सिसोदिया और के. कविता सहित अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर राहत देने से भी इनकार कर दिया था।
याचिका खारिज होने के 10 कारण
1. निष्पक्षता
'बार एंड बेंच' के मुताबिक, जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी जज की निष्पक्षता की एक धारणा होती है। इस धारणा को उस मुकदमेबाज को गलत साबित करना होता है, जो जज को केस से हटाने की मांग कर रहा हो। हालांकि, फैसले में कहा गया कि आवेदकों की निजी आशंका, पक्षपात की उचित आशंका की बुनियादी कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई है।
2. RSS कार्यक्रम में शामिल होने पर क्या कहा?
इस आरोप पर कि वह अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) की तरफ से आयोजित कार्यक्रमों में शामिल हुईं, जो RSS से जुड़ा एक संगठन है। इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा कि वे कार्यक्रम राजनीतिक नहीं थे। जज ने इस बात पर जोर दिया कि बार (वकीलों) और बेंच (जजों) के बीच का रिश्ता सिर्फ कोर्टरूम तक ही सीमित नहीं होता।
3. उनके बच्चों के केंद्र के पैनल वकील होने के मामले पर
जस्टिस शर्मा द्वारा इस केस की सुनवाई करने में 'हितों का टकराव' (conflict of interest) हो सकता है, इस तर्क के संबंध में कि उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट रूप से दिखाना होगा कि जज का फैसला इस रिश्ते से प्रभावित होगा। उन्होंने आगे कहा कि जजों के बच्चों को वकालत करने से नहीं रोका जा सकता, क्योंकि ऐसा करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन होगा। उन्होंने यह भी कहा कि उनके बच्चों में से कोई भी दिल्ली आबकारी नीति (Excise Policy) से जुड़े केस से संबंधित नहीं रहा है।
4. केजरीवाल के पक्ष में दिए गए आदेशों का ज़िक्र न करना
इसके बाद जज ने कुछ ऐसे उदाहरणों का ज़िक्र किया, जिनमें उन्होंने केजरीवाल को 'एकतरफ़ा राहत' (ex-parte relief) दी थी। अदालत ने कहा कि हालांकि, उस समय केजरीवाल ने पक्षपात का कोई आरोप नहीं लगाया था, क्योंकि वे आदेश उनके ही पक्ष में थे।
5. सुप्रीम कोर्ट ने उनके आदेशों को रद्द नहीं किया
जस्टिस शर्मा ने इस बात पर भी जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके आदेशों की समीक्षा की थी। लेकिन उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की थी।
6. गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के संबंध में केजरीवाल की दलील पर जिसमें कहा गया था कि आबकारी नीति मामले में आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जस्टिस शर्मा ने कहा, "इस आधार पर खुद को मामले से अलग करने की मांग करना पूरी तरह से कोरी कल्पना पर आधारित कार्रवाई करने जैसा होगा। कोई राजनेता सार्वजनिक मंच पर क्या बयान देना चुनता है, इस पर इस अदालत का कोई कंट्रोल नहीं है। इसी तरह, यह अदालत राजनेताओं द्वारा दिए गए बयानों को विनियमित भी नहीं कर सकती।"
7. कोई सबूत नहीं, केवल आरोप-प्रत्यारोप
जस्टिस शर्मा ने आगे कहा कि खुद को मामले से अलग करने की मांग वाली याचिका सबूतों के साथ नहीं, बल्कि केवल आरोप-प्रत्यारोप के साथ दायर की गई थी।
8. खुद को अलग करने से राजनीतिक पूर्वाग्रह का आभास होगा
जस्टिस शर्मा ने कहा कि उनके खुद को मामले से अलग करने से जनता के मन में यह धारणा बनेगी कि जज किसी विशेष राजनीतिक दल या विचारधारा से जुड़े हुए हैं। उन्होंने आगे कहा कि इसके संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। कोर्ट ने कहा कि केजरीवाल ने अपने लिए एक ऐसी स्थिति बना ली है जिसमें हर हाल में उनका ही फायदा है।
9. केजरीवाल पर नैरेटिव सेट करने का आरोप
हाई कोर्ट ने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने अपने लिए एक ऐसी स्थिति बना ली है जिसमें हर हाल में उनका ही फायदा है। जस्टिस शर्मा ने कहा, "अगर उन्हें राहत नहीं मिलती, तो वे कहेंगे कि उन्होंने पहले ही इस नतीजे का अंदाजा लगा लिया था। अगर उन्हें राहत मिल जाती है, तो वे कह सकते हैं कि कोर्ट ने दबाव में आकर फैसला दिया। मुकदमा लड़ने वाला व्यक्ति इस स्थिति को अपने नैरेटिव के हिसाब से किसी भी तरह पेश कर सकता है।"
10. अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकते
जस्टिस शर्मा ने आखिरी में कहा कि खुद को इस मामले से अलग कर लेना समझदारी नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य से पीछे हटना होगा। उन्होंने कहा कि यह एक तरह से हार मान लेना होगा। जज ने कहा, "यह कोर्ट आरोपों और इशारों-इशारों में लगाए गए आरोपों से दबकर फैसला नहीं दे सकता। यह कोर्ट तब तक न तो झुकेगा और न ही पीछे हटेगा, जब तक ऐसा करने से खुद इस संस्था की विश्वसनीयता पर कोई असर न पड़े। ऐसा करने पर यह न्याय देना नहीं। बल्कि न्याय को अपने हिसाब से चलाना कहलाएगा।"