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ये तो कमाल हो गया, तमिलनाडु और बंगाल में तख्ता पलट एक बार फिर 'मोदी भरोसे' को पुख्ता कर गया

ये जीत ऐतिहासिक है। ये एक ऐसे जन नेता पर जनता के भरोसा की जीत है जो 2047 हर वर्ग और हर तबके के विकास के लिए तत्पर है। 2014 मे देश भर में जनता का जो भरोसा पीएम मोदी पर दिखा था। कुछ उसी तर्ज पर बंगाल की जीत मानी जा सकती है

Amitabh Sinhaअपडेटेड May 04, 2026 पर 1:37 PM
ये तो कमाल हो गया, तमिलनाडु और बंगाल में तख्ता पलट एक बार फिर 'मोदी भरोसे' को पुख्ता कर गया
बीजेपी आलाकमान जानता था कि जनता को विकास चाहिए , युवा को रोजगार चाहिए, महिला शक्ति को ताकत चाहिए

अद्भुत, अविश्वसनिय लेकिन अकल्पनिय नहीं। बंगाल और तमिलनाडु में तृणमूल कांग्रेस और डीएमके का पिछड़ना एक बात को साबित कर गया कि जनता अब परिवारवाद, भ्रष्टाचार की राजनीति से उब चुकी है। यही कारण है कि इस जीत को बीजेपी अद्भुत और अविश्वसनिय भले ही पा रही हो लेकिन जंग में कूदने से पहले ये अकल्कपनिय नहीं था। बीजेपी आलाकमान जानता था कि जनता को विकास चाहिए , युवा को रोजगार चाहिए, महिला शक्ति को ताकत चाहिए। ममता बनर्जी और स्टालिन जैसे नेता केन्द्र के साथ दो-दो हाथ करने के फेर में पड़े रहे और जनता की नब्ज पकड नहीं पाए।

बीजेपी की जीत के मायने क्या होने वाले हैं इसका अंदाजा विपक्ष को शायद नहीं होगा। लेकिन ये बात तो साबित हो गयी है कि इन नतीजों के बाद ये स्थापित हो जाएगा कि पीएम मोदी के कद के बराबर कोई नहीं हैं। ये मोदी भरोसा ही है कि लोकसभा के तीन चुनाव लगातार बीजेपी ने पीएम मोदी के नेतृत्व में जीते और ये लगने लगा है कि बीजेपी के शब्दकोष में से एंंटी इंकंबेंसी शब्द गायब होता जा रहा है।

ये जीत ऐतिहासिक है। ये एक ऐसे जन नेता पर जनता के भरोसा की जीत है जो 2047 हर वर्ग और हर तबके के विकास के लिए तत्पर है। 2014 मे देश भर में जनता का जो भरोसा पीएम मोदी पर दिखा था। कुछ उसी तर्ज पर बंगाल की जीत मानी जा सकती है। ममता बनर्जी ने 2011 में लेफ्ट को उखाड़ फेंका था लेकिन उसी हिंसा तंत्र का सहारा लेकर वो शासन करती रहीं और भूल गयीं की जिस जनता ने उन पर भरोसा किया उसे हिंसा से नहीं सिस्टम में बदलाव से मतलब था। यही चूक उन पर भारी पड़ी। जेन जी के शब्दों में समझें तो पीएम मोदी भरोसे पर रिफ्रेश बटन दब गया है। ये आने वाले वर्षों में उनकी नीतियों को और मजबूती से लागू कर 2047 तक विकसित भारत बनाने के सपने को पूरा करेगा।

तभी तो नतीजे ये बता रहा हैं कि आसान नहीं होता वोटरों के भरोसे पर हर वक्त खरा उतरना। बंगाल में ममता बैनर्जी की पार्टी का हिंसा तंत्र, बांग्लादेशी घुसपैठियों का साथ, उधर तमिलनाडू में स्टालिन भी ममता की सूर मे सुर मिलाते हुए केन्द्र के हर फैसले का विरोध करते रहे। कभी हिन्दी का नाम पर तो कभी केन्द्र की ऐजेंसियों के खिलाफ वो भी लगातार मोर्च खोले रहे। शायद वो भूल गए थे कि एंटी इंकंबेंसी को दूर रखने के लिए जनता का भरोसा जीतने के लिए भी लडाई लड़नी पड़ती है। तभी तो बंगाल में लेफ्ट-कांग्रेस के बाहर बीजेपी का विकल्प मिला तो जनता ने उन पर भरोसा जताया तो दूसरी तरफ तमिलनाडु में विकल्प एआईडीएमके नहीं बल्कि तमिल सुपरस्टार विजय की पार्टी टीवीके बनी।

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