प्रतीक यादव को DVT थी! ये क्या है जिसने एक बॉडी बिल्डर की भी ले ली जान? उन्होंने नहीं मानी थी डॉक्टरों की ये बात
Prateek Yadav Death: समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेटे और अपर्णा यादव के पति प्रतीक यादव का कल अचानक से निधन हो गया था। जिसके बाद से उनकी मौत को लेकर कई अटकलें लगाई जा रही हैं।
प्रतीक यादव को DVT थी! ये क्या है जिसने एक बॉडी बिल्डर की भी ले ली जान?
Prateek Yadav Death: समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेटे और अपर्णा यादव के पति प्रतीक यादव का कल अचानक से निधन हो गया था। जिसके बाद से उनकी मौत को लेकर कई अटकलें लगाई जा रही हैं। तरह-तरह की साजिश की थ्योरीज सामने आ रही हैं, जिनमें से कई स्टेरॉयड के इस्तेमाल की ओर इशारा कर रही हैं क्योंकि प्रतीक नियमित रूप से जिम जाते थे और उनकी बॉडी काफी मस्कुलर थी। लेकिन असल कहानी सोशल मीडिया पर चल रही बातों से कहीं ज्यादा दुखद और दिल दहला देने वाली है।
अब India Today ने उस डॉक्टर से खास बातचीत की है, जो पिछले पांच साल से प्रतीक का इलाज कर रहे थे। अब पहली बार पूरी सच्चाई धीरे-धीरे सामने आ रही है।
एक ऐसी बीमारी जिसके बारे में ज्यादातर लोगों ने कभी नहीं सुना
पांच साल पहले, प्रतीक यादव सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास गए। वे युवा थे। देखने में स्वस्थ लग रहे थे। लेकिन जांच के बाद जो बीमारी सामने आई, उसने जिंदगीभर उनका पीछा नहीं छोड़ा। दरअसल, प्रतीक को DVT हो गया था।
डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT) एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की गहरी नसों में, खासकर पैरों में, रक्त के थक्के बन जाते हैं। आमतौर पर इसका इलाज संभव है। लेकिन जब कोई थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाता है, तो इससे पल्मोनरी एम्बोलिज्म नामक गंभीर स्थिति पैदा हो जाती है, और ऐसे हालात में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है।
DVT के मरीजों को खून पतला करने वाली दवाएं दी जाती हैं और कई बार उन्हें सालों तक डॉक्टरों की निगरानी में रहना पड़ता है।
प्रतीक भी इसी बीमारी से जूझ रहे थे। India Today ने जिन डॉक्टर से बात की, उनकी पहचान उनकी इच्छा पर गुप्त रखी गई है। डॉक्टर की देखरेख में प्रतीक को खून पतला करने वाली दवाइयां दी गईं और अगले पांच साल तक समय-समय पर उनकी जांच होती रही। इस दौरान जिंदगी सामान्य तरीके से चलती रही। लेकिन 29 अप्रैल तक।
अस्पताल, ICU और एक ऐसा फैसला जिसे कोई रोक नहीं सका
अपने डॉक्टर से फोन पर बात करने के बाद, प्रतीक खुद अस्पताल पहुंचे। जांच के दौरान डॉक्टर उनकी हालत देखकर चिंतित हो गईं। उन्हें सीने में बहुत दर्द था। उन्हें चक्कर आ रहा था। सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। डॉक्टर ने बिना देर किए उन्हें तुरंत ICU में भर्ती कर लिया।
कुछ दिनों तक स्थिति में सुधार होता दिख रहा था। डॉक्टर लगातार उनकी निगरानी कर रहे थे। उनकी देखभाल की जा रही थी। हालात स्थिर होते दिख रहे थे। फिर, 1 मई को, प्रतीक ने डॉक्टरों से कहा कि वह घर जाना चाहता है।
LAMA: वो दो अक्षर जिन्होंने सब कुछ बदल दिया
मेडिकल भाषा में, जब कोई मरीज अपने इलाज करने वाले डॉक्टरों की स्पष्ट सलाह के विरुद्ध अस्पताल छोड़ने का फैसला करता है, तो उसे LAMA कहा जाता है। इसका मतलब होता है - Leave Against Medical Advice यानी बिना मेडिकल सलाह के अस्पताल छोड़ना।
यह डिस्चार्ज नहीं है। इसका मतलब है कि मरीज डॉक्टरों की सलाह को नजरअंदाज करके खुद अस्पताल छोड़ने का फैसला ले रहा है और आगे होने वाली किसी भी स्थिति की जिम्मेदारी खुद लेता है।
डॉक्टर ने प्रतीक को साफ शब्दों में समझाया था। उन्होंने बार-बार उनसे कहा कि उनकी इस हालत में ICU छोड़ना आत्महत्या के बराबर है। आज भी जब वे उन बातचीत को याद करती हैं, तो वे यही शब्द इस्तेमाल करती हैं - आत्महत्या। लेकिन प्रतीक, जो अपनी जिद के लिए जाने जाते थे, ने मन बना लिया था। उन्हें ICU की मशीनों की लगातार बीप की आवाज उन्हें परेशान कर रही थी। नर्सों का दिन-रात आना-जाना, यह घुटन भरा माहौल उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें अपना घर चाहिए था। उन्हें अपने बच्चे चाहिए थे।
उनकी पत्नी अपर्णा हर मुश्किल घड़ी में उनके साथ थीं। उन्होंने उन्हें समझाया। उन्होंने बार-बार उनसे अनुरोध किया कि वे रुकें और अपना इलाज पूरा करें। डॉक्टर को याद है कि अपर्णा ने उन्हें अस्पताल में रखने के लिए अपनी पूरी कोशिश की। लेकिन लेकिन न डॉक्टर और न ही उनकी पत्नी, कोई भी प्रतीक का फैसला बदल नहीं सका।
आखिरकार प्रतीक ने कागजात पर हस्ताक्षर किए और अस्पताल से चले गए।
हालांकि घर पर भी उनकी देखभाल की पूरी व्यवस्था थी। उनकी सेवा के लिए तीन लोगों की नर्सिंग टीम 24 घंटे मौजूद रहती थी, ताकि उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो। अस्पताल छोड़ने के बाद भी डॉक्टर लगातार नर्सिंग स्टाफ के संपर्क में थीं। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि प्रतीक घर पर नियमित रूप से अपनी दवाइयां ले रहे थे। इसकी जानकारी नर्सिंग स्टाफ डॉक्टर को देता रहता था।
डॉक्टर के रिकॉर्ड के अनुसार, प्रतीक से उनकी आखिरी सीधी बात 3 मई को हुई थी। इसके बाद उनका संपर्क केवल नर्सिंग स्टाफ से रहा, प्रतीक से सीधे नहीं।
उसके बाद सन्नाटा छा गया। 13 मई 2026 की सुबह 5:55 बजे, लखनऊ के सिविल अस्पताल में प्रतीक को मृत घोषित कर दिया गया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट क्या कहती है
इंडिया टुडे के पास उपलब्ध पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्टेरॉयड या किसी नशे वाली चीज का जिक्र नहीं है। रिपोर्ट में साफ मेडिकल भाषा में यह लिखा गया है: प्रतीक की मौत फेफड़ों में खून का बड़ा थक्का जमने की वजह से हुई, जिससे उनके दिल और सांस लेने की प्रक्रिया अचानक बंद हो गई।
यानी पिछले पांच साल से जिस खून के थक्के को दवाइयों और इलाज से नियंत्रित किया जा रहा था, आखिरकार वही थक्का टूटकर जानलेवा साबित हुआ।
रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रतीक के शरीर पर छह चोटों के निशान मिले थे। ये निशान उनके सीने, दाहिने हाथ, दाहिने बाजू, कोहनी और बाएं हाथ की कलाई पर थे। इन्हें दो हिस्सों में बांटा गया है। पुरानी चोटें, जो लगभग 5 से 7 दिन पुरानी हैं, प्रतीक के घर पर गिरने से संबंधित हैं, जिसके बाद उन्हें 29 अप्रैल को अस्पताल लाया गया था। यह चोट इतनी गंभीर थी कि जानलेवा स्थिति की संभावना को खत्म करने के लिए उनके सिर का सीटी स्कैन कराया गया था। नई चोटें, जो लगभग एक दिन पुरानी हैं, एक और बार गिरने से संबंधित हैं, इस बार घर पर अपने अंतिम क्षणों में बेहोश होने के बाद। उनके डॉक्टर को दोनों बार गिरने की जानकारी थी।
एक सबसे जरूरी बात यह भी है कि प्रतीक खून पतला करने वाली दवाइयां ले रहे थे। ऐसी दवाइयों की वजह से चोट और नीले निशान सामान्य से ज्यादा गंभीर दिखाई देते हैं।
चोटों के निशान किसी साजिश या गलत हरकत का सबूत नहीं माने जा रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, लंबे समय से खून पतला करने वाली दवाइयां लेने वाले व्यक्ति के शरीर पर गिरने के बाद ऐसे निशान दिखना सामान्य बात है।
पोस्टमार्टम के दौरान दिल और फेफड़ों में मिले खून के थक्कों के नमूनों को आगे की जांच के लिए सुरक्षित रखा गया है। वहीं, शरीर के कुछ अन्य नमूने भी केमिकल जांच के लिए भेजे गए हैं।
एक आदमी जो घर जाना चाहता था
प्रतीक सिर्फ 38 साल के थे। वे फिट थे, जवान थे, और शायद, उनकी उम्र के कई लोगों की तरह उन्हें भी पूरी तरह एहसास नहीं था कि मामला इतना गंभीर हो सकता है। वह पिछले पांच सालों से DVT जैसी बीमारी के साथ जी रहे थे। वह नियमित रूप से जांच करवाते थे औ समय पर दवाइयां लेते था। शायद उनके मन में यह था कि कुछ दिनों के लिए घर जाना कोई बड़ा खतरा नहीं है, बल्कि सिर्फ थोड़ा आराम करने जैसा है।
उन्हें अपने बच्चों की बहुत याद आ रही थी। वह बस घर जाकर अपने बच्चों के साथ रहना चाहते थे।
शायद उन्हें अंदाजा नहीं था, या वह मानना नहीं चाहते थे, कि 1 मई को ICU से बाहर निकलना उनकी जिंदगी का आखिरी बड़ा फैसला साबित होगा। वह सिर्फ 38 साल के थे। उन्हें लगता था कि अभी उनके पास बहुत समय है और सब ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
और यही इस कहानी का सबसे बड़ा दुखद पहलू है। स्टेरॉयड की बात नहीं है। बस एक नौजवान की यही ख्वाहिश थी कि वह अपने बच्चों के पास घर लौट जाए। और लौट भी गया।
ये बातें इसलिए शेयर की जा रही हैं ताकि हम सभी इससे कुछ सीख सकें। प्रतीक का सबसे अहम सबक बहुत सीधा-सा है: अपने डॉक्टर की बात सुनो। मशीन की बीप की आवाज, अस्पताल के कमरे की बेचैनी, घर जाने की चाहत, इनमें से कुछ भी आपकी जिंदगी के लायक नहीं है। अस्पताल के अंदर होने वाली छोटी-मोटी तकलीफें बाहर की खामोशी को रोकने के लिए होती हैं।