अनीता कात्याल

अनीता कात्याल
Assembly Elections 2023 : पिछले दो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की भाजपा के मुकाबले करारी हार हुई है। उधर, कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हाशिये पर ला खड़ा किया है। ऐसे में दोनों से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस एक बार फिर जाति आधारित राजनीति का दामन थामते नजर आ रही है। इस साल पांच राज्यों में विधासभा और अगले साल लोकसभा चुनावों को ध्यान में रख कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदली है। वह अन्य पिछड़ी जातियों का भरोसा फिर से हासिल करना चाहती है। उसने कहा है कि वह जातीय जनगणना के पक्ष में है। अगर वह चुनाव जीत जाती है तो पूरे देश में जातीय जनगणना कराएगी। साथ ही, वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के आरक्षण पर लगी 50 फीसदी की सीमा को भी हटा देगी।
कांग्रेस कार्यसमिति ने पारित किया प्रस्ताव
हाल में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इस बारे में प्रस्ताव पास किया गया है। इससे पहले महिला आरक्षण बिल पर लोकसभा में चर्चा के दौरान पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ओबीसी महिलाओं के लिए सब-कोटा की मांग की थी। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ने जातिगत जनगणना का डेटा सार्वजनिक करने के बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ऐलान का स्वागत किया है।
'जितनी आबादी, उतना हक' का नारा
पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस मसले पर मुखर नजर आए हैं। वह अपनी चुनावी रैलियों में लगातार जातीय जनगणना की जरूरत पर जोर देते आए हैं। उन्होंने कहा कि देशभर में जातीय जनगणना कराया जाना चाहिए। उन्होंने 'जितनी आबादी, उतना हक' का नारा भी दिया है। उनके इस नारे का मतलब है कि जिस जाति की आबादी में हिस्सेदारी का जो अनुपात होगा, उसी के हिसाब से उसे सरकारी नौकरियों और एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में भी मौके मिलेंगे। अगर यह पॉलिसी लागू होती है तो देश की आबादी में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाले ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों और एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में पढ़ाने के ज्यादा मौके उपलब्ध होंगे।
ओबीसी का भरोसा हासिल करना आसान नहीं
कांग्रेस इस नारे का असर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में देखना चाहती है। दरअसल, इन राज्यों की आबादी में अन्य पिछड़ा वर्गों की ज्यादा हिस्सेदारी है। अच्छे नतीजे आने पर पार्टी इस फार्मूला का इस्तेमाल अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में भी करेगी। उसका मानना है कि इससे वह BJP के हिंदुत्व आधारित राजनीति का मुकाबले करने में सफल रहेगी। उसका यह भी मानना है कि इस मामले में वह भाजपा से आगे है, क्योंकि भाजपा जातीय जनगणना के पक्ष में नहीं रही है। लेकिन, कांग्रेस के लिए ओबीसी वर्गों का भरोसा हासिल करना आसान नहीं है। इसकी वजह जानने के लिए इतिहास में जाना होगा।
सालों तक कांग्रेस ने ओबीसी पर नहीं दिया ध्यान
जवाहरलाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक करीब हर कांग्रेसी प्रधानमंत्री काका केलकर कमीशन और मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने में नाकाम रहा। इन रिपोर्टों में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछले वर्गों की पहचान करने और उनकी उन्नति के लिए खास उपाय उपायों के बारे में बताया गया था। अब सवाल है कि अचानक कांग्रेस के इस ओबीसी प्रेम पर पिछड़ी जातियां कितना भरोसा करेंगी? अब तक कांग्रेस ने कभी इन जातियों की सुध लने की कोशिश नहीं की। उसका भरोसा ब्राह्मण, मुस्लिम और अनुसूचित जाति-जनजाति पर था।
मुख्यमंत्रियों की मदद ले रही पार्टी
ओबीसी का भरोसा हासिल करने के लिए कांग्रेस अपने ओबीसी मुख्यमंत्रियों की मदद ले रही है। इनमें छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल, राजस्थान में अशोक गहलोत और कर्नाटक में सिद्धरमैया शामिल हैं। कांग्रेस यह भी दिखाना चाहती है कि वह संगठन और सरकार के अहम पदों पर ओबीसी नेताओं की नियुक्ति के पक्ष में है। बघेल और गहलोत भी ओबीसी वर्गों का भरोसा हासिल करने की हर कोशिश कर रहे हैं। वे भी रैलियों में जाति आधारित सर्वें की बात कर रहे हैं। लेकिन, ये कोशिशें कितनी सफल होंगी, आने वाले समय में पता चलेगा। उधर, भाजपा पिछड़े वर्गों का 44 फीसदी वोट हासिल कर इस गेम में पहले से कांग्रेस से आगे दिख रही है। BJP के इस दावे को कांग्रेस कैसे नकार सकती है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद एक पिछड़ी जाति से आते हैं।
(अनीता कात्याल दिल्ली की स्वतंत्र पत्रकार हैं। यहां व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं। इनका इस पब्लिकेशन से कोई संबंध नहीं है।)
हिंदी में शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट न्यूज़, बिजनेस न्यूज़, पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App डाउनलोड करें।