Rajasthan Election: जिन राजपूतों ने 2018 में गिराई BJP की सरकार, वही इस बार कराएंगे सत्ता में वापसी? 2 बड़े कारण
Rajasthan Election 2023: राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 2018 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। इसकी एक बड़ी वजह राजपूत समुदाय की पार्टी से नाराजगी रही। यही कारण रहा कि 2018 में बीजेपी की ओर से चुनाव में उतार गए 26 राजपूत उम्मीदवारों में से 16 चुनाव हार गए थे
Rajasthan Election 2023: बीजेपी ने महाराणा प्रताप के वंशज विश्वराज सिंह मेवाड़ को भी पार्टी में शामिल कराया है
Rajasthan Election 2023: राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 2018 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। इसकी एक बड़ी वजह राजपूत समुदाय की पार्टी से नाराजगी रही। चुनाव से करीब एक साल पहले 2017 में 'पद्मावत' फिल्म आई थी। राजस्थान में और खासतौर से राजपूत समुदाय में काफी आधार रखने वाली करणी सेना इस फिल्म का काफी उग्र तरीके से विरोध कर रही थी। राजस्थान के कई इलाकों में फिल्म के विरोध प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ की घटनाएं भी हुई थीं। उनकी मांग फिल्म पर बैन लगाने की थी। हालांकि ऐसा नहीं होने पर उनका गुस्सा फिल्म की जगह बीजेपी की ओर मुड़ गया, जो उस वक्त राज्य और केंद्र, दोनों जगहों पर सत्ता में थी।
करणी सेना को लगभग पूरे राजपूत समुदाय का समर्थन प्राप्त था। यही कारण रहा कि बीजेपी की ओर से चुनाव में उतार गए 26 राजपूत उम्मीदवारों में से सिर्फ 10 को ही जीत मिली। बीजेपी राज्य में अपनी सत्ता बचाने में नाकाम रही और और राजपूतों की नाराजगी को इसका एक बड़ा कारण माना गया।
हालांकि, बीजेपी के खिलाफ यह गुस्सा रातोंरात सिर्फ एक फिल्म के कारण नहीं बना था। राजपूत समुदाय और बीजेपी के बीच अनबन का सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव में शुरू हुआ। तब बीजेपी ने अपने बड़े राजपूत चेहरे जसंवत सिंह को बाड़मेर से लोकसभा टिकट देने से इनकार कर दिया था।
इसके दो साल बाद राजपूत समुदाय से आने वाले हिस्ट्रीशीटर चतुर सिंह को एक मुठभेड़ में मारा गया। राजपूत समुदाय के कई लोगों ने तब इस एनकाउंट के फर्जी होने का आरोप लगाया था। अगले साल, 2017 में एक और गैंगस्टर आनंदपाल सिंह (फिर से राजपूत) को एक मुठभेड़ में गोली मार दी गई। इसके बाद राजस्थान में कई दिनों तक सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हुए। इस कड़ी में आखिरी कील दीपिका पादुकोण की फिल्म 'पद्मावत' रही।
इन सब कारणों से राजपूत समुदाय को लगा कि बीजेपी उन्हें नजरअंदाज कर रही है और उनकी बीजेपी से निराशा चरम पर पहुंच गई। जल्द ही वसुंधरा राजे की अगुआई में बीजेपी 2018 का चुनाव हार गई।
यह मामला तब और आगे बढ़ गया जब राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर वसुंधरा राजे और गृह मंत्री अमित शाह के बीच झड़प हो गई। शाह ने जोधपुर के सांसद गजेंद्र शेखावत को तरजीह दी, जो राजपूत समुदाय से आते हैं। हालांकि राजे इस फैसले के खिलाफ थीं। कई राजपूत अभी भी वसुंधरा राजे से नाराज हैं।
बीजेपी ने इन 2 कदमों से राजपूतों का गुस्सा शांत किया
भाजपा इस बार राजपूतों के गुस्से को शांत करने में जुटी हुई। इसके लिए इसनने हाल ही में पोलो खिलाड़ी भवानी सिंह कालवी को पार्टी में शामिल कराया है। भवानी सिंह, उन्हीं दिवंगत लोकेंद्र सिंह कालवी के बेटे हैं, जिन्होंने 2018 में बीजेपी को हराने की अपील की थी। भवानी सिंह कालवी को जयपुर में पार्टी में शामिल करने के बजाय, उन्हें दिल्ली ले जाया गया और प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और सांसद दीया कुमारी की उपस्थिति में बीजेपी मुख्यालय में शामिल किया गया।
बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे पार्टी की सोच राजपूत समुदाय में अपने विश्वास को "बहाल" करने की थी। सिर्फ इतना ही नहीं, बीजेपी ने महाराणा प्रताप के वंशज विश्वराज सिंह मेवाड़ को भी पार्टी में शामिल कराया है। करीब तीन दशक बाद उनके परिवार से कोई व्यक्ति राजनीति में आया है। विश्वराज सिंह मेवाड़ को नाथद्वारा से उम्मीदवार बनाया गया है, जिस सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता सीपी जोशी का कब्जा है। यह कहने की बात नहीं है कि महाराणा प्रताप 'राजपूताना गर्व' के सबसे बड़े चेहरे हैं।
एक सूत्र ने न्यूज18 को बताया कि बीजेपी की इस गुगली के बाद सीपी जोशी ने अपने क्षेत्र के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में उन्हें बीजेपी उम्मीदवार विश्वराज सिंह मेवाड़ पर आक्रामक हमले और बयानबाजी नहीं करने की सलाह दी गई, ताकि कहीं गलती से "राजपूतों की भावना" न आहत हो जाए।
विश्वराज सिंह को आधिकारिक तौर पर पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने शामिल कराया। यह एक सोचा समझा फैसला था, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि बीजेपी, राजपूत समुदाय के लिए गहरा सम्मान करती है।
तो क्या इससे BJP को फायदा मिलेगा?
हमारे सहयोगी न्यूज 18 ने पद्मावती की भूमि चित्तौड़गढ़ का दौरा किया, जहां 2018 में काफी विरोध प्रदर्शन देखन को मिला। टीम ने राजपूत समुदाय के पुरुषों, महिलाओं, प्रोफेशनल्स और कारोबारियों आदि से मुलाकात की। इस दौरान मोटे तौर पर भावना यह रही कि राजपूत समुदाय बीजेपी के साथ वापस आ रहा है। फूलवती नाम की एक महिला ने कहा, 'मेरी बीजेपी से कोई दुश्मनी नहीं है. मैं मोदी जी के नाम पर वोट दूंगा।"
युवा गृहिणी ललिता ने बीजेपी के साथ अपने जुड़ाव की तुलना एक परिवार से की। उन्होंने कहा, "जब आप एक परिवार में रहते हैं, तो कुछ मतभेद सामने आते हैं। हां, हमें कुछ गड़बड़ियां थीं। लेकिन अब सब कुछ ठीक है। राजपूत हमेशा से भाजपा के साथ रहे हैं। हम भाजपा के साथ थे और हैं।"
गणपत सिंह शेखावत मार्केटिंग और सेल्स में हैं और जयपुर के बाहरी इलाके में रहते हैं। उन्होंने कहा, "मैं विकास के नाम पर वोट दूंगा। अगर हम जाति या सामुदाय के आधार पर वोट देना शुरू करेंगे तो यह राज्य के लिए अच्छा नहीं होगा।"
इस बीच, माथे पर तिलक लगाने वाले स्थानीय हनुमान सिंह राठौर का कहना है कि यह कहना गलत होगा कि राजपूतों और बीजेपी के बीच कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने कहा, 'देखिए, चुनावों के दौरान हर समुदाय बेहतर प्रतिनिधित्व चाहता है। राजपूत भी ऐसा ही करते हैं। लेकिन हमारे मन में बीजेपी के लिए कोई विशेष गुस्सा नहीं है।" उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप के वशंज विश्वराज सिंह मेवाड़ के बीजेपी में जाने से काफी फर्क पड़ा है।
कुल मिलाकर राजपूत समुदाय में बीजेपी के खिलाफ साल 2014 में जो चिंगारी भड़की थी और 2018 में जिसने एक बड़ी आग का रूप ले लिया था, वह 2023 में बुझती दिख रही है।