Union Budget 2022: बजट का सरकार के फिस्कल डेफिसिट पर किस तरह पड़ता है असर?

कोरोना का काबू में करने के लिए सरकार ने खर्च बढ़ाया, जिससे वित्त वर्ष 2020-21 में फिस्कल डेफिसिट बढ़कर 9.5 फीसदी पर पहुंच गया। वित्त वर्ष 2021-22 में इसके 6.8 फीसदी पर रहने का अनुमान है

अपडेटेड Jan 27, 2022 पर 5:35 PM
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ज्यादा फिस्कल डेफिसिट डिमांग और आउटपुट के लिए अच्छा है। दरअसल, डेफिसिट ज्यादा होने पर सरकार दो में से कोई एक कदम उठा सकती है। पहला, वह टैक्स बढ़ा सकती है। दूसरा, वह ज्यादा कर्ज ले सकती है।

साल 2020 में कोरोना की महामारी शुरू होने के बाद दुनियाभर में सरकारों की फिस्कल पॉलिसी (Fiscal Policy) और केंद्रीय बैंकों की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) में बड़ा बदलाव देखने को मिला। दरअसल, इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) पर कोरोना के असर को कम करने करने के लिए अर्थव्यवस्था को सपोर्ट की जरूरत थी। इसलिए दुनिया की कई देशों की सरकारों और केंद्रीय बैंकों ने फिस्कल पॉलिसी और मॉनेटरी पॉलिसी में तालमेल दिखाया। सरकार को खर्च बढ़ाने में मदद करने के लिए केंद्रीय बैंकों ने बेंचमार्क रेट्स घटाए।

हालांकि, सरकार के खर्च बढ़ाने से ग्रोथ को सपोर्ट तो मिलता है, लेकिन इससे इनफ्लेशन बढ़ने का भी डर होता है। ऐसा होने पर केंद्रीय बैंक को इंट्रेस्ट रेट बढ़ाकर मनी सप्लाई/लिक्विडिटी घटानी पड़ती है। फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (FRBM) एक्ट, 2003 के लागू होने के बाद से सरकार का लक्ष्य फिस्कल डेफिसिट को 3 फीसदी पर रखना रहा है। इसमें कामयाबी भी मिली। फिस्कल डेफिसिट वित्त वर्ष 2011-12 के 5.8 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2018-19 में 32.4 फीसदी पर आ गया। हालांकि, कोरोना की महामारी की वजह से सरकार के लिए खर्च बढ़ाना जरूरी हो गया।

इसलिए सरकार ने फिस्कल डेफिसिट के एफआरबीएम के टार्गेट को थोड़े समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया। वित्त वर्ष 2020-21 में फिस्कल डेफिसिट बढ़कर 9.5 फीसदी पर पहुंच गया। वित्त वर्ष 2021-22 में इसके 6.8 फीसदी पर रहने का अनुमान है। खर्च बढ़ाने के अलावा इंडिया में रिजर्व बैंक (RBI) ने उदार मॉनेटरी पॉलिसी अपनाई। अभी भारत में ब्याज दर ऐतिहासिक निचले स्तर पर है। अभी, फिस्कल डेफिसिट ज्यादा होने के बावजूद मॉनेटरी पॉलिसी उदार बनी हुई है। सवाल है कि क्या फिस्कल डेफिसिट का ऊंचा स्तर इकोनॉमी के लिए नुकसानदेह है?


इस सवाल के दो जवाब हैं। ज्यादा फिस्कल डेफिसिट डिमांग और आउटपुट के लिए अच्छा है। दरअसल, डेफिसिट ज्यादा होने पर सरकार दो में से कोई एक कदम उठा सकती है। पहला, वह टैक्स बढ़ा सकती है। दूसरा, वह ज्यादा कर्ज ले सकती है। अगर सरकार ज्यादा कर्ज लेती है तो प्राइवेट सेक्टर के कर्ज के लिए ज्यादा पैसा नहीं बचता है। साथ ही ज्यादा कर्ज लेने से ब्याज दर बढ़ जाती है जिससे प्राइवेट सेक्टर के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है। फिस्कल डेफिसिट ज्यादा होने से करेंसी की वैल्यू भी घटती है। इससे आयात महंगा हो जाता है, जिससे करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ जाता है। फिस्कल डेफिसिट का असर दूसरे एसेट पर भी पड़ता है।

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