Budget 2023: फिस्कल डेफिसिट क्या है, बजट से पहले इसकी इतनी चर्चा क्यों है?

Budget 2023: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इकोऩॉ़मी को सहारा देने के लिए खर्च बढ़ाने के उपाय करती हैं तो इससे फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) बढ़ने का खतरा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि फिस्कल डेफिसिट को जल्द नियंत्रण में लाने की जरूरत है। लंबी अवधि में इकोनॉमी की बेहतरी के लिए यह जरूरी है

अपडेटेड Dec 07, 2022 पर 5:31 PM
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एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबे समय तक फिस्कल डेफिसिट का ज्यादा होना इकोनॉमी के लिए अच्छा नहीं है।

Budget 2023: यूनियन बजट (Union Budget) पेश होने की तारीख नजदीक आ गई है। इसलिए इसकी चर्चा बढ़ रही है। बजट से इकोनॉमी, शेयर बाजार, इनवेस्टर्स, टैक्सपेयर्स, इंडस्ट्रीज को काफी उम्मीदें होती हैं। फाइनेंस मिनिस्टर (Finance Minister) के सामने सबकी उम्मीदें पूरी करने का चैलेंज होता है। इस बार निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) पर कोरोना की मार के बाद पटरी पर लौट रही इकोनॉमी को मजबूती देने की जिम्मेदारी भी है। इंडियन इकोनॉमी की सेहत अच्छी है। लेकिन, ग्लोबल इकोनॉमी की हालत ठीक नहीं है। केंद्रीय बैंकों के लगातार इंटरेस्ट रेट बढ़ाने, जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता और सप्लाई चेन में रुकावट की वजह से कई बड़े देशों पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है।

फिस्कल डेफिसिट की चर्चा इतनी ज्यादा क्यों हो रही है?

अगर इंडियन इकोनॉमी की ग्रोथ तेज करने के लिए सीतारमण खर्च बढ़ाने के उपाय करती हैं तो इससे फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) बढ़ने का खतरा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि फिस्कल डेफिसिट को जल्द नियंत्रण में लाने की जरूरत है। लंबी अवधि में इकोनॉमी की बेहतरी के लिए यह जरूरी है।


फिस्कल डेफिसिट का मतलब क्या है?

आखिर यह फिस्कल डेफिसिट क्या है? इकोनॉमी के लिए यह क्यों इतना अहम है? इसे नियंत्रण में लाना क्यों जरूरी है? आइए इन सवालों का जवाब जानने की कोशिश करते हैं। आसान शब्दों में कहा जाए तो फिस्कल डेफिसिट का मतलब सरकार की आय (Revenue) और खर्च के बीच का अंतर है। सरकार को टैक्स से काफी पैसा मिलता है। इसमें डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स दोनों शामिल हैं। जैसे-इनकम टैक्स, जीएसटी, कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी और कई तरह के सेस। इसके अलावा सरकार को सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने, डिविडेंड और इंटरेस्ट से भी इनकम होती है।

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सरकार क्यों कर्ज लेती है?

सरकार उपर्युक्त स्रोतों से मिले पैसे को कई जगह खर्च करती है। इनमें एंप्लॉयीज की सैलरी, पेंशन, इंफ्रास्ट्रक्चर पर निवेश शामिल है। सरकार को मार्केट से लिए गए कर्ज पर इंटरेस्ट भी चुकान होता है। जिस तरह हमें भी कई बार कर्ज लेना पड़ता है, उसी तरह सरकार भी अपने खर्च को पूरा करने के लिए कर्ज लेती है।

सरकार अपनी इनकम और एक्सपेंडिचर के बीच के गैप को पूरा करने के लिए पैसे उधार लेती है। वह मार्केट में बॉन्ड जारी कर पैसे जुटाती है। स्मॉल सेविंग्स स्कीमों से मिले पैसे का भी इस्तेमाल वह अपने खर्च को पूरा करने के लिए लेती है। चूंकि, सरकार ज्यादातर कर्ज देश के अंदर लेती है यानी रुपये में लेती है, जिससे विदेशी निवेशकों के इंडियन मार्केट से अपने पैसे अचानक निकालने पर उस पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है। यही वजह है कि सरकार की तरफ से जारी होने वाले बॉन्ड के कुछ ही हिस्से को विदेशी निवेशकों को खरीदने की इजाजत होती है।

सरकार अपनी इनकम से ज्यादा खर्च क्यों करती है?

सरकार के अपनी इनकम से ज्यादा खर्च करने की कई वजहे हैं। वह बुनियादी सुविधाओं पर बड़ी रकम खर्च करती है। सड़क, एयरपोर्ट, बंदरगाह, रेलवे जैसी बुनियादी सुविधाओं में निवेश करने से उद्योग और व्यापार बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके अलावा सरकार पर नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं देने की भी जिम्मेदारी होती है। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली आदि शामिल हैं।

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