Union Budget 2023: इस बार बजट से पहले कैपिटल गेंस (Capital Gains) के नियमों को लेकर काफी चर्चा हो रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) कैपिटल गेंस टैक्स के नियमों में बदलाव का ऐलान 1 फरवरी, 2023 को कर सकती हैं। इसकी वजह यह है कि अभी जो नियम हैं, उनमें कई कमियां हैं। लंबे समय से इन कमियों को दूर करने की मांग हो रही है। अगल-अलग एसेट के लिए होल्डिंग पीरियड के नियम अलग-अलग हैं। इससे इनवेस्टर्स काफी उलझन में पड़ जाता है। नियमों में समानता होने से इनवेस्टर्स के लिए उन्हें समझना आसान होगा। इससे निवेश को बढ़ावा मिलेगा। टैक्स कंप्लायंस भी बढ़ेगा।
क्या है एक्सपर्ट्स की राय?
Tax2win.in के को-फाउंडर और सीईओ अभिषेक सोनी ने कहा, "अभी हर कैपिटल एसेट का होल्डिंग पीरियड अलग है। टैक्स रेट भी अलग-अलग हैं। इसे आसान बनाया जा सकता है।" दूसरे एक्सपर्ट्स का भी यही मानना है। उनका कहना है कि इस बार बजट में कैपिटल गेंस टैक्स के नियमों की खामियां दूर करने का ऐलान फाइनेंस मिनिस्टर कर सकती हैं।
म्यूचुअल फंड की स्कीमों के लिए नियम अलग-अलग
म्यूचुअल फंड की डेट स्कीम की यूनिट्स को तीन साल के बाद बेचने पर हुए फायदे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस माना जाता है। उधर, इक्विटी फंड की यूनिट्स को एक साल के बाद बेचने पर हुए प्रॉफिट को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस माना जाता है। रियल एस्टेट और गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों को दो साल के बाद बेचने पर हुए मनाफे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस माना जाता है।
लंबी अवधि के इनवेस्टमेंट को प्रोत्साहित करने की जरूरत
मुंबई के चार्टर्ड अकाउंटेंट बलवंत जैन ने कहा, "बॉन्ड शॉर्ट टर्म एसेट क्लास है, जबकि इक्विटी लॉन्ग टर्म एसेट क्लास है। शेयरों में निवेश पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस के नियम ऐसे होने चाहिए, जिससे इनवेस्टर्स उनमें लंबे समय के लिए पैसे लगाने के लिए उत्साहित रहे।" उन्होंने कहा कि डेट फंड की यूनिट्स के लिए एक साल के पीरियड को लॉन्ग टर्म माना जाना चाहिए। इक्विटी म्यूचुअल फंडों के लिए लॉन्गट पीरियड तीन साल होने चाहिए। रियल एस्टेट के लिए यह पांच साल होने चाहिए।
छोटे निवेशकों की मिलनी चाहिए राहत
अभी नियम यह है कि अगर इनवेस्टर्स को किसी फाइनेंशियल ईयर में शेयरों और इक्विटी म्यूचुअल फंड्स से लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस 1 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होता है तो उसे टैक्स चुकाने की जरूरत नहीं है। कैपिटल गेंस एक लाख रुपये से ज्यादा होने पर उसे 10 फीसदी टैक्स चुकाना जरूरी है। एस के पटौदिया एंड एसोसिएट्स के एसोसिएट डायरेक्टर (डायरेक्ट टैक्स) मिहिर टना ने कहा, "अभी टैक्स छूट की जो लिमिट है वह अपर्याप्त है। इस लिमिट को बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये या ज्यादा करने की जरूरत है। किसी व्यक्ति की इनकम एक फाइनेंशियल ईयर में 2.5 लाख रुपये होने पर टैक्स नहीं लगता है।"
जैन ने कहा कि किसी एक वित्त वर्ष में शेयरों से होने वाले एक लाख रुपये के लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस पर फ्लैट 10 फीसदी रेट से टैक्स लगता है, भले ही आप शेयरों को कितने साल भी रखें। शेयरों और इक्विटी म्यूचुअल फंड की यूनिट्स में इनवेस्टमेंट पर होने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस के कैलकुलेशन के लिए इंडेक्सेशन बेनेफिट की इजाजत होनी चाहिए।
टैक्स के रेट में अंतर इतना ज्यादा क्यों?
शेयरों में निवेश पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस टैक्स का रेट 15 फीसदी है। यह नियम तब लागू हुआ था, जब इनकम टैक्स का मिनिमम रेट 10 फीसदी था। जैन ने कहा, "अब इनकम टैक्स का मिनिमम रेट 5 फीसदी है। ऐसे में 5 फीसदी इनकम टैक्स स्लैब में आने वाले इनवेस्टर्स को 15 फीसदी का यह शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस टैक्स बहुत ज्यादा लगता है। इसलिए छोटे इनवेस्टर्स को राहत देने की जरूरत है।" डेट म्यूचुअल फंड पर लॉन्ट टर्म कैपिटल गेंस टैक्स अभी 20 फीसदी है, जबकि शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस पर टैक्स इनवेस्टर्स के इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से लगता है।