बाद के वर्षों में उन्होंने कुछ अन्य कंपनियां भी खरीदीं, मसलन मद्रास एल्युमीनियम, भारत एल्युमीनियम कंपनी (51% हिस्सेदारी) और सरकारी कंपनी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL)। इन कंपनियों के अधिग्रहण ने अग्रवाल को मेटल और माइनिंग मैग्नेट बना दिया। अग्रवाल ने 2003 में लंदन में वेदांता रिसोर्सेज की नींव रखी। हालांकि, वेदांता को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कंपनी की माइनिंग गतिविधियों का विरोध किया। साथ ही, केंद्र सरकार ने 2010 में कंपनी की बॉक्साइट माइन पर भी रोक लगा दी थी। उनके ऑयल एंड गैस बिजनेस को भी नुकसान पहुंचा था। केंद्र की यूपीए सरकार ने राजस्थान में वेदांता के ऑयल फील्ड का विस्तार करने की अनुमति देने से मना कर दिया था। इसी समय अंतरराष्ट्रीय कमोडिटीज मार्केट में भारी गिरावट का दौर शुरू हो गया था, जिससे अग्रवाल को 2018 में कंपनी को लंदन स्टॉक एक्सचेंज से हटाने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि, अगले कुछ सालों में वेदांता ने दुनिया भर में कई माइंस का अधिग्रहण किया और कंपनी ने सेमीकंडक्टर बिजनेस में भी एंट्री की।