इनफ्लेशन (Inflation) में नरमी के संकेत दिखे हैं। घरेलू इकोनॉमी (domestic economy) की बुनियादी स्थितियां भी पहले से बेहतर लग रही हैं। लेकिन, ग्लोबल इकोनॉमी (Global economy) की अनिश्चितता का असर इस पर पड़ सकता है। RBI के बुलेटिन (RBI Bulletin) में ये बातें कही गई हैं। यह बुलेटिन 18 नवंबर को जारी किया गया।
इस बुलेटिन में कहा गया है, "आर्थिक गतिविधियों से जुड़े प्रमुख संकेतक इंडियन इकोनॉमी की बेहतर सेहत के बारे में बता रहे हैं। हालांकि, वैश्विक स्थितियां चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। हालात अनिश्चित दिख रहे हैं।" शहरी इलाकों में मांग बहुत मजबूत दिख रही है। लेकिन, ग्रामीण इलाकों में मांग अब भी कमजोर है।
आरबीआई हर महीने बुलेटिन पेश करता है। इसमें मुख्य रूप से ऐसे आर्टिकल्स शामिल होते हैं जो ग्लोबल और डोमेस्टिक इकोनॉमी के ट्रेंड्स के बारे में बताते हैं। इसमें कहा गया है कि ग्लोबल इकोनॉमी को लेकर डाउनसाइड रिस्क बना हुआ है। ग्लोबल फाइनेंशियल स्थितियों पर दबाव दिख रहा है। लिक्विडिटी में आ रही कमी का असर फाइनेंशियल मार्केट में प्राइस मूवमेंट पर पड़ रहा है।
मार्केट्स अब पॉलिसी रेट्स को लेकर संभावित नरमी को लेकर राहत की सांस ले रहा है। इस वजह से जोखिम लेने की क्षमता फिर से बढ़ रही है। इंडिया में इकोनॉमी में सप्लाई से जुड़े मसलों में सुधार आ रहा है। आरबीआई इस साल मई से अब तक इंटरेस्ट रेट 1.90 फीसदी बढ़ा चुका है इससे रेपो रेट 5.40 फीसदी पर पहुंच गया है।
इनफ्लेशन लगातार आरबीआई की टारगेट रेंज से ज्यादा बने रहने से आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की चुनौतियां बढ़ी हैं। यह लगातार तीन तिमाहियों से आरबीआई के टारगेट से ज्यााद बना हुआ है। इसके चलते केंद्रीय बैंक को सरकार को यह बताना पड़ेगा कि इनफ्लेशन को वह क्यों नहीं काबू में कर पाया।
इस बुलेटिन में यह भी कहा गया है कि रिटेल इनफ्लेशन दुनिया के कई देशों में हाई लेवल पर बना हुआ है। इसकी वजह फूड और एनर्जी की कीमतों में हुआ इजाफा है। कोरोना की महामारी ने सप्लाई चेन की बाधाओं को बढ़ाया है। लेकिन, कुछ देशों में इनफ्लेशन में कमी के संकेत दिखने लगे हैं। खासकर उभरते देशों में ऐसा देखने को मिला है।