अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट में पेश एक नए बिल ने भारतीय आईटी कंपनियों की नींद उड़ा दी है। पहले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके व्यापार सलाहकार पीटर नवारो की इंडिया पर टेढ़ी नजरें हैं। हालांकि, एनालिस्ट्स का कहना है कि यह बिल एक राजनीतिक हथकंडा है इसका इंडिया की 280 अरब डॉलर की टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री पर तुरंत कोई असर पड़ने नहीं जा रहा है। सवाल है कि आखिर यह नया बिल क्या है?
इस बिल में क्या कहा गया है
इसे यूएस हाल्टिंग इंटरनेशनल रिलोकेशन ऑफ एंप्लॉयमेंट (HIRE) बिल नाम दिया गया है। इस बिल में कहा गया है कि अगर कोई कंपनी किसी विदेशी कंपनी को उन सेवाओं के लिए पेमेंट करती है, जिसका इस्तेमाल अमेरिका में होता है तो उस कंपनी को 25 फीसदी टैक्स चुकाना होगा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस बिल के मौजूदा स्वरूप में पास होने की उम्मीद नहीं है। लेकिन, इससे इंडिया के 280 अरब डॉलर की आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है।
बिल का असर 70% यूएस कंंपनियों पर पड़ेगा
EY India ग्लोबल बिजनेस सर्विसेज एंड ऑपरेशंस के पार्टनर अरिंदम सेन ने मनीकंट्रोल को दिए इंटरव्यू में कहा, "इस बिल के पास होने के लिए काफी लॉबीइंग और वोटिंग की जरूरत पड़ेगी। इसके पारित होने की संभावना इसलिए नहीं है, क्योंकि इसका असर अमेरिका की 70 फीसदी कंपनियों पर पड़ेगा।" लेकिन, यह तय है कि इस बिल और ट्रेड से जुड़े अमेरिकी सरकार के अधिकारियों की टिप्पणी ने भारत की आईटी इंडस्ट्री के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।
पहले से ही इंडियन आईटी कंपनियां सुस्त डिमांड का सामना कर रही हैं
EIIR Trend के फाउंडर पारीख जैन ने कहा, "इसका तुरंत यह असर पड़ेगा कि अमेरिकी कंपनियां इंडिया के साथ नई डील और निवेश करने की रफ्तार सुस्त कर देंगी।" पहले से ही इंडियन कंपनियों को बड़े ऑर्डर मिलने की रफ्तार में कमी देखने को मिली है। खासकर अमेरिका में ऐसा देखने को मिला है। उन्हें ज्यादा ऑर्डर यूरोप से मिले हैं। यह बिल ऐसे वक्त सीनेट में पेश हुआ है, जब पहले से इंडियन आईटी कंपनियां मुश्किल दौर का सामना कर रही हैं।
इंडियन आईटी कंपनियों का अमेरिका पर काफी ज्यादा निर्भरता
इंडिया की बड़ी आईटी कंपनियां बिनजेस के लिए अमेरिका पर काफी ज्यादा निर्भर हैं। इनमें Tata Consultancy Services (TCS), Infosys, HCLTech, Wipro और Tech Mahindra शामिल हैं। इनका 50-65 फीसदी रेवेन्यू अमेरिका से आता है। जियोपॉलिटिकल टेंशन और अमेरिकी इकोनॉमी को लेकर अनिश्चितता की वजह से पहले से इंडियन आईटी कंपनियां दबाव में हैं। एआई का इस्तेमाल बढ़ने से कंपनियों ने हायरिंग भी घटाई है। Fortune 500 की कंपनियां इंडियन आईटी कंपनियों की क्लाइंट्स हैं। इनमें Citigroup, JPMorgan Chase, Bank of America, Pfizer, Microsoft और Saint Gobain जैसी कंपनियां शामिल हैं।
यूएस-इंडिया आईटी संबंधों पर मंडरा रहा खतरा
HFS Research के सीईओ फिल फ्रेश्ट ने कहा कि हायर बिल अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है और इसके जल्द कानून बनने की संभावना कम है। लेकिन, इससे अमेरिका केंद्रित भारतीय आईटी कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि पहले से ही इंडियन आईटी कंपनियां अमेरिका में बढ़ती कॉस्ट और क्लाइंट्स की तरफ से खर्च में सुस्ती का सामना कर रही हैं। वीजा प्रतिबंध, टैरिफ के खतरों और जियोपॉलिटिकल टेंशन की वजह से पहले से ही अमेरिका-इंडिया आईटी संबंध खतरे में दिख रहा है।