कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि आप बिल्कुल ठीक हो ना सिर दर्द, ना चक्कर, ना कोई कमजोरी लेकिन कभी-कभी छोटी बातें भूल जाते हैं जैसे चाबी कहां रखी थी या फोन किस कमरे में छोड़ा। आप इसे उम्र का असर मानकर टाल देते हैं। लेकिन हो सकता है कि आपके दिमाग में कुछ ऐसा हो रहा हो जिसे आप न तो देख सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं और यही चुपचाप बढ़ रहा खतरा आने वाले सालों में आपकी याददाश्त, सोचने-समझने की ताकत और पहचानने की क्षमता को छीन सकता है। इसके पीछे का कारण हो सकता है साइलेंट ब्रेन इन्फार्क्ट यानी मौन मस्तिष्क रोधगलन ।
क्या होता है साइलेंट ब्रेन इन्फार्क्ट ?
ये छोटे-छोटे स्ट्रोक की तरह होते हैं जो आपके दिमाग में तब होते हैं जब खून का प्रवाह कुछ सेकंड्स या मिनट्स के लिए रुक जाता है। खून नहीं पहुंचता, तो उस हिस्से के ब्रेन सेल्स मरने लगते हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि इसका कोई लक्षण नहीं होता न कोई चक्कर, न बोलने में दिक्कत, न चलने में परेशानी, यही कारण है कि इन्हें साइलेंट यानी मौन कहा जाता है। लेकिन जब एमआरआई या सीटी स्कैन कराया जाता है तो पता चलता है कि दिमाग के अंदर छोटी-छोटी चोटें मौजूद हैं।
ये चोटें क्यों खतरनाक हैं?
रिसर्च बताते हैं कि जिन लोगों के ब्रेन में साइलेंट इन्फार्क्ट होते हैं, उनमें डिमेंशिया का खतरा लगभग 1.5 गुना बढ़ जाता है। डिमेंशिया सिर्फ भूलने की बीमारी नहीं है यह आपकी सोचने की क्षमता, तर्क, भावनाएं और यहां तक कि खुद की पहचान तक को धीरे-धीरे मिटा देती है। इन चोटों की वजह से दिमाग के वो हिस्से जो यादें, भाषा, योजना बनाना और निर्णय लेने का काम करते हैं वो धीरे-धीरे खराब होने लगते हैं। एक तरह से ये चोटें दिमाग की दीवारों में दरारें हैं जो धीरे-धीरे पूरी इमारत को कमजोर बना देती हैं।
हाई ब्लड प्रेशर बसे बड़ा कारण है। लगातार बढ़ा हुआ बीपी दिमाग की नाजुक नसों को कमजोर कर देता है। डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल, और धूम्रपान भी इन चोटों के जोखिम को कई गुना बढ़ाते हैं। जिन लोगों को दिल की बीमारियां हैं, या जिनका लाइफस्टाइल बहुत बैठा-बैठा वाला है, उनमें भी ये खतरा अधिक होता है। ये खासतौर पर 50 की उम्र पार कर चुके लोगों में ज्यादा देखने को मिलता है, लेकिन गलत आदतें इसे जल्दी भी बुला सकती हैं।
कैसे पहचानें? और क्या बचाव है?
चूंकि ये मौन हैं, इसलिए आमतौर पर तब तक नहीं पकड़ में आते जब तक दिमागी स्कैन न हो। लेकिन कुछ संकेतों को नजरअंदाज़ नहीं करना चाहिए जैसे चीजें जल्दी भूल जाना, नाम या रास्ते भूलना, बातचीत के दौरान ध्यान भटकना, निर्णय लेने में परेशानी, बार-बार मूड का बदलना। अगर ऐसा कुछ महसूस हो, तो डॉक्टर से बात करें और जरूरी टेस्ट करवाएं ।