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इस मछली को खाने से हो सकता है कैंसर! बैन के बावजूद धड़ल्ले से बिक रही जानलेवा कैटफिश

Thai Magur: थाई मागुर एक मांसाहारी प्रजाति की मछली है। यह जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में अन्य मछलियों को खतरे में डालती है। रिसर्च के अनुसार, भारत में देशी मछली प्रजातियों में 70% की गिरावट के लिए इसे जिम्मेदार ठहराया जाता है

Curated By: Abhishek Guptaअपडेटेड Jun 28, 2025 पर 6:59 PM
इस मछली को खाने से हो सकता है कैंसर! बैन के बावजूद धड़ल्ले से बिक रही जानलेवा कैटफिश
NGT ने इस मछली की अत्यधिक शिकारी प्रकृति के कारण इसके प्रजनन पर प्रतिबंध लगा दिया

Thai Magur: भारत के कई तटीय और नदी क्षेत्रों में मछली चावल के साथ परोसा जाने वाला एक मुख्य भोजन है। लेकिन यह जरूरी है कि आप ऐसी मछली खाने के लिए चुनें जो फायदेमंद हो न की खतरनाक। दरअसल एक खास मछली ने हेल्थ और पर्यावरण से संबंधी चिंताएं पैदा कर दी हैं। इसे थाई मागुर या क्लैरियस गैरीपिनस के नाम से जाना जाता है। यह कैटफिश कभी देश भर के तालाबों और मछली बाजारों में खूब मिलती थी। लेकिन पर्यावरणीय चिंताओं और कैंसर से इसके संबंध की बढ़ती आशंकाओं के कारण इसे आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित कर दिया गया।

भारत में क्यों प्रतिबंधित है मागुर मछली?

वैज्ञानिक रूप से क्लैरियस गैरीपिनस के रूप में जानी जाने वाली थाई मागुर 3-5 फुट लंबी, हवा में सांस लेने वाली मछली है जो सूखी जमीन पर भी चल सकती है। साथ ही यह अपने कृत्रिम श्वसन प्रणाली (ARS) के कारण मिट्टी में भी जीवित रह सकती है। यह कैटफिश के समूह से संबंधित है। थाई मागुर कम लागत और मार्केट में अच्छी डिमांड के कारण काफी लोकप्रिय है। हालांकि पारिस्थितिक और हेल्थ संबंधी चिंताओं के कारण भारत में इसका प्रजनन और पालन साल 2000 से ही प्रतिबंधित है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने इस मछली की अत्यधिक शिकारी प्रकृति के कारण इसके प्रजनन पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे जलाशयों का पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित होता था। इसके अलावा इसे महत्वपूर्ण हेल्थ जोखिमों का कारण भी माना जाता है। यह मछली जूं का वाहक है, और रिसर्च में इसके सेवन से कैंसर होने का खतरा भी सामने आया है। सरकार ने इसकी फार्मिंग, बिक्री और खपत पर रोक लगा रखी है।

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