एक सवाल को लेकर हमारे बीच अक्सर चर्च होती रहती है। इंडिया में गरीबी (Poverty) घटी है या बढ़ी है? मशहूर इकोनॉमिस्ट्स Angus Deaton और Valerie Kozel ने अपनी बुक The Great Indian Poverty Debate में इस बहस को शामिल किया। Deaton को बाद में कंजम्प्शन, पवर्टी और वेल्फेयर का एनालिसिस करने के लिए नोबेल प्राइज तक मिला। यह मसला एक तरह जहां इकोनॉमिस्ट्स की बहस का मुद्दा रहा है वही दूसरी तरह देश का आम आदमी भी इस सवाल का जवाब जानना चाहता है। खासकर तब जब आजादी के बाद से ही देश की हर सरकार गरीबी हटाने को अपना मिशन बनाती रही हैं। लेकिन, 75 साल बाद भी यह ऐसी बहस है जो खत्म होने का नाम नहीं ले रही।
1947 में 80% आबादी गरीब होने का अनुमान
1947 में इंडिया की आजादी के वक्त यह माना गया था कि देश की करीब 80 फीसदी आबादी गरीब है। फिर, सरकार की इकोनॉमिक और सोशल पॉलिसी का फोकस गरीबी घटाने पर रहा। गरीबी का अनुमान लगाने का काम प्लानिंग कमीशन ने शुरू किया। गरीबी रेखा के सिद्धांत की शुरुआत हुई। इसमें यह तय किया गया कि एक व्यक्ति की अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए कितनी इनकम होनी चाहिए। इसके लिए व्यक्ति के जीवित रहने के लिए न्यूनतम कैलरी की जरूरत को आधार बनाया गया। अलग-अलग राज्यों के शहरी और ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का अनुमान लगाया गया।
प्लानिंग कमीशन ने गरीबी का पता लगाना शुरू किया
प्लानिंग कमीशन को गरीबी रेखा और इसके नीचे रहने वाले लोगों की संख्या का अनुमान लगाने का काम सौंपा गया। देश के लिए लेवल तय करने के अलावा प्लानिंग कमीशन ने शहरी और ग्रामीण गरीबी को मापने के लिए हर राज्य के हिसाब से मानक जारी किए। लेकिन, सरकार पर गरीबी के असल आंकड़ों के मुकाबले कम आकड़ें दिखाने के आरोप लगे। इसके बाद सरकार ने गरीबी रेखा और गरीबी अनुपात का अनुमान लगाने के लिए कमेटी बनाई। हर कमेटी ने गरीब के निर्धारण के लिए अलग-अलग तरीके (मेथड्स) इस्तेमाल किए।
एक के बाद एक कई कमेटी बनीं
2009 में प्लानिंग कमीशन ने प्रोफेसर सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी ने 1993-94 में ऑल इंडिया गरीबी अनुपाता को 36 फीसदी से बढ़ाकर 45 फीसदी कर दिया। इस कमेटी का गरीबी अनुपात सरकार को सही नहीं लगा। इसलिए उसने डॉ सी रंगराजन की अध्यक्षता में एक नई कमेटी बनाई। रंगराजन कमेटी ने 2011-12 ने ऑल इंडिया गरीबी रेशियो को 21.9 फीसदी से संशोधित कर 29.5 फीसदी कर दिया।
कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे के नतीजों का इंतजार
पिछले करीब 10 साल गरीबी को लेकर गंभीर बहस नहीं हुई है, क्योंकि सरकार ने कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे प्रकाशित करना बंद कर दिया। गरीबी का अंदाजा लगाने के लिए यह सर्वे बहुत जरूरी था। अंतिम सर्वे 2011-12 में प्रकाशित किया गया था। 2017-18 में एक कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे किया गया, लेकिन इसके नतीजे प्रकाशित नहीं किए गए। लेकिन, इसके नतीजे मीडिया में लीक हो गए, जिससे यह पता चला कि ग्रामीण इलाकों में गरीबी बढ़ी है। सरकार ने 2022-23 में सर्वे शुरू किए हैं। इसके नतीजों का इंतजार है।
नीति आयोग तीन पैमानों पर लगा रही गरीबी का अनुमान
सरकार ने प्लानिंग कमीशन को भी खत्म कर दिया। इसकी जगह नीति आयोग ने ले लिया। नीति आयोग यूनाइटेड नेशंस मल्टीडायमेंशनल पवर्टी इंडेक्स का इस्तेमाल करता है। इसमें गरीबी का अनुमान लगाने के लिए तीन मानकों का इस्तेमाल होता है। इसमें हेल्थ, एजुकेशन और स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग शामिल हैं। नीति आयोग अपने एनालिसिस का आधार नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) को बनाता है। NHFC 2015-16 की रिपोर्ट के मुताबिक मल्टीडायमेंशनल पवर्टी रेशियो (MPR) 29.9 फीसदी है। ग्रामीण इलाकों में MPR 32.7 फीसदी है, जबकि शहरी इलाकों में 8.8 फीसदी है।
पिछले दशक में गरीबी में कमी
सभी राज्यों में सबसे ज्यादा 52 फीसदी MPR बिहार का है। केरल का 0.7 फीसदी है। लेकिन, सरकार के गरीबी के अनुमान पर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। इसलिए रिसर्चर्स ने अपने एनालिसिस पेश किए हैं। Sutirtha Roy और Roy van der Weide ने 2022 में एक पेपर प्रकाशित किए थे। इसमें कहा गया है कि पिछले दशक में इंडिया में गरीबी में कमी आई है। लेकिन, यह कमी उतनी नहीं है, जितना अनुमान लगाया गया था। इस रिसर्च में यह कहा गया है कि 2019 में अत्यंत गरीबी 12.3 फीसदी थी, जो 2011 के मुकाबले कम थी। इसमें ग्रामीण इलाकों में गरीबी में काफी कमी आने की भी बात कही गई है।