Union Budget 2022: केंद्रीय बजट 2022-23 को पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तैयार किया जाना है। इन राज्यों में गोवा, उत्तराखंड, मणिपुर, पंजाब और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। इसमें उत्तर प्रदेश राज्य का चुनाव सत्ताधारी दल के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली ने भी अपनी हालिया इंडिया इक्विटी स्ट्रैटजी नोट में इसका जिक्र किया है।
ब्रोकरेज ने अपने नोट में कहा, "चुनाव के लिहाज से भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं। इस चुनाव में अगर सत्ताधारी दल को झटका मिलता है तो यह कई पॉलिसी की गति बदल सकता है। हम पहले भी कह चुके हैं कि सरकारी नीतियां हमारे आशावादी नजरिए का प्रमुख स्रोत हैं। अगर न्यूनतम असर की बात करें तो भी इस चुनाव में प्रतिकूल नतीजे अस्थिरता पैदा करेंगे।' मॉर्गन स्टैनली का यह नोट बताया है कि आगामी चुनवा कितने महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में जाहिर है कि केंद्रीय बजट को तैयार करते समय भी इन राज्यों पर नजर डाला जाएगा। इसके अलावा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को इस बार बजट तैयार करते समय कई अन्य मुश्किल विकल्पों का भी सामना करना है।
कोरोना की दूसरी लहर के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी-शेप की रिकवरी की बात कर रहे हैं। अर्थव्यस्था से जुड़ी RBI की रिपोर्ट में मांग में सुधार और टिकाऊ रिकवरी की बात कही गई है।
ग्रोथ इंजन कहा जाने वाला कॉरपोरेट सेक्टर भी ठीक-ठाक स्थिति में है। कॉरपोरेट और बैंकिंग दोनों सेक्टर्स की बैलेंस शीट महामारी से पहले की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में है। ट्विन बैलेंस शीट की समस्या काफी हद तक खत्म होती दिख रही है, खासकर अब जब हमारे पास 'बैड बैंक' है। NBFC और यहां तक कि कुछ हद तक रियल एस्टेट सेक्टर के बैलेंस शीट के बारे में भी यही कहा जा सकता है। कंपनियों ने पब्लिक और प्राइवेट दोनों मार्केट से भारी मात्रा में नकदी जुटाई है। लंबे समय से निवेश का लेकर जो सूखा था, वह समाप्त होने की ओर है।
निश्चित रूप से, अगर आर्थिक सुधार गति पकड़ा रहा है तो, सरकार के पास चुनाव से पहले जनता को कुछ रियायतें देने के लिए अतिरिक्त कैश होना चाहिए?
लेकिन यहां इंफ्लेशन एक समस्या हो सकती है, खातसौर से कोर इंफ्लेशन। लंबी अवधि के बॉन्ड यील्ड बढ़ गए हैं। RBI लिक्विडिटी को कम करने की कोशिश कर रही है। ओमीक्रोन वेरिएंट के चलते सप्लाई चेन से जुड़ी दिक्कत एक बार फिर सामने आ खड़ी हुई है, जिससे अधिक सप्लाई-साइड इंफ्लेशन की आशंका बढ़ गई है।
गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में बैंकों का निवेश घट रहा है। इसे नीच दिए गए चार्ट में देखा जा सकता है। इसके मुकाबले बैंक क्रेडिट में बहुत मामूली सुधार हुआ है। ग्रोथ रेट अभी भी दहाई के अंक से कम है। अर्थव्यवस्था में तेजी के साथ क्रेडिट ग्रोथ में भी बढ़ोतरी होगी और बैंकों के पास सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश के लिए कम फंड बचेगा। यील्ड और बढ़ेगी। अधिक राजकोषीय घाटा समस्या को और बढ़ा देगा।
हालांकि शायद सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2022-23 के केंद्रीय बजट को अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि के नजरिए से तैयार किया जाएगा, जो शायद पिछले एक दशक से अधिक समय में शायद ही कभी हुआ हो। कई सालों बाद यह पहली बार है, जब विकसित देशों के सेंट्रल बैंक अपनी मॉनिटरी पॉलिसी को सख्त करने पर मजबूर हुए हैं। इससे बाजारों में लिक्विडिटी के खत्म होने का खतरा है। कोई नहीं जानता है कि आने वाले समय में कौन सी बड़ी आर्थिक समस्या आकर खड़ी हो जाए? ग्लोबल इकोनॉमी बहुत कम ब्याज दरों की आदी है। ऐसे में यह कोई नहीं जानता कि ब्याज दरें बढ़ने से दुनिया पर क्या असर पड़ेगा।
यही कारण है कि फिडेलिटी इंटरनेशनल ने अगले साल ग्लोबल इकॉनमी के लिए जारी अपनी रिपोर्ट का शीर्षक 'कैच 2022' दिया है। यह शीर्षक 'कैच-22' नाम के एक अंग्रेजी मुहावरे पर आधारित है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार इस मुहावरे का अर्थ ॉहै, 'एक ऐसी दुविधा या कठिन परिस्थिति जिससे परस्पर विरोधी या आश्रित परिस्थितियों के कारण कोई बच नहीं सकता।'
संक्षेप में कहा जाए तो, वित्त वर्ष 2022-23 के लिए केंद्रीय बजट एक बड़ी अनिश्चितता की पृष्ठभूमि में बनाया जाएगा। यह अनिश्चितता पिछले बजट के समय से भी अधिक है, क्योंकि तब सभी का एकसूत्रीय एजेंडा था कि किसी भी तरह से महामारी के कहर से उबरना है। इस बार भी महामारी का खतरा बना हुआ है, लेकिन उसके था ही कई और जोखिम भी पैदा हो गए हैं। बजट में वित्त मंत्री जो विकल्प चुनती हैं, वे ही हमें बताएंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था इन जोखिमों से कितनी अच्छी तरह निपटेगी।