यूक्रेन से लौटे छात्रों को सता रही भविष्य की चिंता, सरकार से लगा रहे गुहार
यह दुनिया तमाम अलग-अलग देशों में बंटी है। सभी देशों की अपनी-अपनी सीमाएं और संप्रभुता भी है। बावजूद इसके अधिकतर देश व्यापारिक और कूटनीतिक बंधनों के चलते एक दूसरे से जुड़े हैं। वहीं अगर किसी एक देश में कोई संकट आता है, तो उसका असर कहीं न कहीं पूरी दुनिया पर पड़ता है। कोरोनावायरस महामारी इसका एक सटीक उदाहरण है।
इसी तरह रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग (Russia Ukraine War) का असर न सिर्फ उन दो देशों पर पड़ रहा है, बल्कि छोटे-बड़े कई देश इससे प्रभावित हो रहे हैं। भारत में इसका असर आपको उन छात्रों के रूप में साफ दिखेगा, जो यूक्रेन से अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ कर स्वदेश लौटने को मजबूर हुए हैं।
इन छात्रों को अब अपने भविष्य की चिंता सता रही है। यह सभी छात्र यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे। इस युद्ध के चलते मानों इनके करियर की गाड़ी अभी थम सी गई है और आगे की राह का भी कुछ पता मालूम नहीं पड़ता।
सरकार ने संसद में क्या कहा?
6 अप्रैल को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में कहा कि भारत यूक्रेन से निकाले गए छात्रों की पढ़ाई जारी रखने के लिए हंगरी, रोमानिया, कजाकिस्तान और पोलैंड जैसे देशों के साथ बातचीत कर रहा है।
विदेश मंत्री ने कहा कि यूक्रेनी सरकार ने भी छात्रों को उनके मेडिकल एजुकेशन कोर्स में दो प्रमुख परीक्षा देने के लिए छूट की पेशकश की है।
उन्होंने सदन को बताया, "अनिवार्य CROC परीक्षा अगले शैक्षणिक वर्ष के लिए स्थगित कर दी गई है। छठे साल के छात्रों को अनिवार्य CROC-2 परीक्षा दिए बिना, केवल एकेडमिक परफॉर्मेंस के आधार पर डिग्री दी जाएगी।"
सरकार का कहना है कि वह उन देशों के साथ संपर्क कर रही है, जहां की शिक्षा यूक्रेन मॉडल से मिलती है। इसके अलावा कई छात्र सरकार की इस योजना से सहमत नहीं है। यूक्रेन से लौटे ऐसे ही कुछ भारतीय छात्रों से हमने भी बात की और जाना कि आखिर वे दूसरे देशों में पढ़ाई के लिए क्यों नहीं जाना चाहते।
मेहताब और उनके कुछ साथी पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर लोकसभा स्पीकर तक अपनी गुहार लगा चुके हैं। इन छात्रों ने सरकार के सामने अपनी कुछ मांगे रखी हैं।
भारतीय छात्रों ने PMO को लिखा पत्र (Moneycontrol Hindi)
किसी दूसरे देश में क्यों नहीं जाना चाहते छात्र?
मेहताब यूक्रेन के सूमी से लौटे हैं और चौथे साल के मेडिकल स्टूडेंट हैं। वह हंगरी, रोमानिया या पोलैंड जैसे किसी दूसरे देश में अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए नहीं जाना चाहते हैं। उनका कहना है कि अगर हम पोलैंड की ही बात करें, तो वहां मेडिकल कोर्स की फीस यूक्रेन के मुकाबले दोगुना या तीन गुना है। इसके अलावा वहां रहने-खाने का खर्च भी ज्यादा है।
इस अंतर को उन्होंने ऐसे समझाया कि यूक्रेन में अभी चार लाख रुपए के करीब हमारी यूनिवर्सिटी फीस है। करीब पांच से सात लाख रुपए हमारा पूरा खर्च बैठता है। दूसरे जो देश हैं, जैसे हंगरी या पोलैंड में वहां कम से कम ट्यूशन फीस ही करीब छह से सात लाख रुपए है। पूरा खर्चा मिला कर वो 14 से 15 लाख रुपए बैठेगा।
"इसके अलावा फिर जाना, ट्रांसफर और एडमिशन प्रोसेस कराना। साथ ही एजेंट्स को भी दोबारा पैसा देना होगा। इस सब से हम लोगों को गुजरना होगा, जो काफी मुश्किल है हम लोगों के लिए।"
उन्होंने आगे बताया कि हमें वहां भाषा की समस्या भी आएगी। हम यूक्रेन में थो, तो हमें वहां की भाषा पढ़ाई जा रही थी। अब अगर हम किसी दूसरे देश में जाएंगे, तो हमें फिर से वहां की भाषा सीखनी पड़ेगी।
इस बात को उन्होंने ऐसे समझाया कि जो तीसरे साल या उससे आगे के छात्र हैं, उनकी क्लीनिकल ट्रेनिंग होती है। उन्हें वहां ट्रेनिंग के लिए अस्पताल जाना होता है। उन्हें मरीजों से बातचीत करनी होती है। ऐसे में दूसरे देशों में जाने पर उन्हें काफी दिक्कतें आएंगी, क्योंकि जरूरी नहीं कि वहां पर भी हर कोई अंग्रेजी में ही बात करे।
मेहताब ने आगे कहा कि किसी भी नए देश में जाने पर हमें वहां सही तरीके से सेटल होने में सात से आठ महीने लगते हैं। अभी हमारे पास इतना समय नहीं है कि किसी दूसरे देश में जाएं वहां की भाषा सीखें और कई महीनों में वहां ठीक से सेटल हों। उन्होंने आगे कहा, "अभी हम वैसे भी वॉर जोन से आएं हैं और यह सभी NATO के देश हैं। वहां भी महौल तनावपूर्ण हैं।"
मेहताब के दोस्त और राजस्थान के रहने वाले छात्र हरीश ने भी किसी दूसरे देश में शिफ्ट होने को लेकर आर्थिक बोझ बढ़ने की बात कही। उन्होंने कहा कि हमारी सबसे बड़ी दिक्कत खर्च है, जो दो से तीन गुना बढ़ जाएगा।
हरीश ने कहा कि यूक्रेन से ट्रांसफर लेने में, फिर एजेंट के जरिए एडमिशन लेने में, यह सब बहुत लंबी प्रक्रिया होगी, जिसमें काफी वक्त लग जाएगा और पैसे भी लगेंगे। उन्होंने बताया कि हमारे सभी डॉक्यूमेंट अभी यूक्रेन में ही हैं।
मेहताब की तरह ही हरीश भी चौथे साल के मेडिकल स्टूडेंट हैं। अपने घर वालों के मन बैठ चुके डर के बारे में बताते हुए, उन्होंने कहा, "घर वाले काफी डरे हुए हैं। किस देश में अब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता है। पहले चीन में कोरोना आया, फिर यूक्रेन में युद्ध।"
विदेश क्यों पढ़ने जाते हैं भारतीय छात्र?
मेडिकल की पढ़ाई के लिए भारतीय छात्र विदेश क्यों जाते हैं? इस सवाल के जवाब में हरीश ने कहा कि आप मान लीजिए कि 12 लाख छात्रों ने NEET की परीक्षा दी, जिसमें करीब 80 हजार सीट होती हैं। ऐसे में 11 लाख से ज्यादा छात्रों का डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह गया। अब वे सभी यह तो नहीं करेंगे कि स्ट्रीम बदल लें।
अब उनके पास सिर्फ दो ही ऑप्शन बचते हैं। पहला यह कि या तो भारत में ही प्राइवेट कॉलेज से मेडिकल की पढ़ाई करें। अब अगर आप प्राइवेट की फीस देखेंगे, तो वो 80 लाख से एक करोड़ रुपए के ऊपर बैठती है। मध्यम वर्ग के छात्र इतना पैसा नहीं दे सकते हैं। इसलिए वे दूसरा ऑप्शन यानी बाहर जाने को ही चुनते हैं।
उन्होंने कहा कि यूक्रेन जैसे दूसरे देशों में 30 से 40 लाख रुपए में मेडिकल की पढ़ाई हो जाती है। ऐसे में यूक्रेन की मेडिकल की पढ़ाई दूसरे देशों के मुकाबले काफी अच्छी और बेहतर है। इसलिए ज्यादातर बच्चे विदेश में पढ़ाई करने जाते हैं।
हरीश ने बताया कि यूक्रेन में हमारी 6 साल की फीस 20 लाख रुपए है। इसमें आने जाने का और दूसरे खर्च मिला कर 35 से 40 लाख रुपए पड़ जाएगा। वहीं अगर किसी दूसरे देश में शिफ्ट होना पड़ता है, तो यह खर्च तीन गुना तक बढ़ सकता है।
हरीश और मेहताब के एक और साथी मयंक गोयल, यूक्रेन की तरनोपिल नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी के पांचवें साल के छात्र हैं। मूल रूप से हरियाणा के रहने वाले मयंक ने बताया कि मेरा डेढ़ साल बचा है। हमें OPD के अंदर भी जाना होता है। वहां जो मरीज आते हैं, वे अपनी स्थानीय भाषा में बात करते हैं। किसी भी दूसरे देश में जाने पर मुझे अब वहां की भाषा सीखनी पड़ेगी।
उन्होंने कहा, "मेरे पास केवल डेढ़ साल बचा है। इसमें मुझे अपनी क्लीनिकल ट्रेनिंग भी पूरी करनी है। मुझे अपने एग्जाम की भी तैयारी करनी है, तो मेरे पास इतना समय नहीं कि मैं खाली बैठूं और इंतजार करूं।"
मयंक ने आगे कहा कि मैं एक चीज और समझाना चाहूंगा कि मेडिकल की पढ़ाई प्रैक्टिकल वाली पढ़ाई है। आप अगर सोचें कि ऑनलाइन इसे पढ़ लेंगे, तो वो नहीं हो सकता।
'कौनसा बम कहां गिरे किसे पता?'
उन्होंने कहा, "हमें यूनिवर्सिटी से एक रिक्वेस्ट लेटर मिला है, जिसमें मांग की गई है कि हमें यहां पर स्थानीय अस्पताल में अपनी क्लीनिकल ट्रेनिंग पूरी करने का मौका दिया जाए, लेकिन उस लेटर को अभी तक सरकार या NMC की तरफ से मान्यता नहीं दी गई है।"
मयंक ने कहा, "किसी ने नहीं सोचा था कि यूक्रेन के ऊपर इस तरह हमला हो जाएगा। परिवार की बात करें, तो अगर में हंगरी या पोलैंड जाता हूं, तो वह भी NATO का हिस्सा हैं और रूस तो सबसे ही खफा है। सीधी बात है, कौन जानता है कि कौनसा बम कहां आकर गिरेगा।"
उन्होंने कहा, "किसी भी मां-बाप को अपने बच्चों के करियर से ज्यादा उनकी जंदगी प्यारी है। जो बच्चे वहां से आए हैं, उनके मन में इतनी दहशत है कि अब अगर यहां वे दिवाली पर बमों की आवाज भी सुनेंगे, तो एक बार को सहम जाएंगे। हम सब लोग अभी एक सदमे में हैं, क्योंकि हमने अपनी आंखों के सामने एक इतने खूबसूरत देश को उजड़ते हुए देखा है।"
सरकार से क्या चाहते हैं यह छात्र?
मेहताब, हरीश और मयंक इन तीनों ही छात्रों ने एक ही बात कही कि सरकार बाहर किसी दूसरे देश के बजाए यहीं पर हमारी पढ़ाई के लिए कुछ व्यवस्था कराए।
मेहताब ने कहा कि हम यह नहीं कहते हैं कि आप हमें फ्री में या सरकारी कॉलेज में पढ़ने दें। हम जो फीस यूक्रेन में दे रहे थे, वो ही फीस हम यहां भी दे देंगे। साथ ही हम वो परीक्षा भी देने के लिए तैयार हैं, जो विदेश पढ़कर आने वाले छात्र यहां पर प्रैक्टिस करने के लिए देते हैं।
वहीं मयंक ने कहा कि सरकार हमारे उस लेटर को अगर मान्यता देती है, तो हमें आसानी हो जाएगी। उससे में अपने इलाके के किसी भी सरकारी अस्पताल में जाकर अपनी क्लीनिकल ट्रेनिंग कर पाऊंगा।
हरीश ने यह भी कहा कि भारत में 9 सेमेस्टर होते हैं और यूक्रेन में 12 सेमेस्टर होते हैं। सरकार चाहे तो हमारे सेमेस्टर के हिसाब से देख कर, जिस भी सेमेस्टर में चाहे हमें एडमिशन दे दे।