No Detention Policy: 5वीं और 8वीं के बच्चों पर अब क्या होगा असर, क्या थी 'नो डिटेंशन पॉलिसी', अब क्या कुछ होगा बदलाव? जानें सबकुछ
शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक, स्कूली शिक्षा राज्य का विषय है इसलिए राज्य इस बारे में अपना-अपना फैसला ले सकते हैं। हालांकि, केंद्र सरकार के इस फैसले का असर केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सैनिक स्कूलों सहित करीब 3 हजार से ज्यादा स्कूलों पर पड़ेगा। एक बड़ी राहत ये भी दी गई है कि स्कूल 5वीं और 8वीं में फेल होने वाले छात्रों को निकाल नहीं सकते
No Detention Policy: 5वीं और 8वीं के बच्चों पर अब क्या होगा असर, क्या थी 'नो डिटेंशन पॉलिसी', अब क्या कुछ होगा बदलाव? जानें सबकुछ
स्कूली शिक्षा से जुड़ा एक बड़ा नियम केंद्र सरकार बदल दिया। केंद्र ने सोमवार को कक्षा 5 और 8 के छोत्रों के लिए 'नो-डिटेंशन पॉलिसी' को खत्म कर दिया। इस पॉलिसी के खत्म होने से अब 5वीं और 8वीं क्लास के छात्र अगर फाइनल एग्जाम में फेल होते हैं, तो उन्हें अगली क्लास में तब तक प्रमोट नहीं किया जाएगा, जब तक वह छात्र उसे पास न कर ले। पहले ये होता था कि अगर कोई फाइनल एग्जाम में फेल हो गया, तो उसे अगली क्लास में प्रमोट कर दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक, स्कूली शिक्षा राज्य का विषय है इसलिए राज्य इस बारे में अपना-अपना फैसला ले सकते हैं। हालांकि, केंद्र सरकार के इस फैसले का असर केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सैनिक स्कूलों सहित करीब 3 हजार से ज्यादा स्कूलों पर पड़ेगा। एक बड़ी राहत ये भी दी गई है कि स्कूल 5वीं और 8वीं में फेल होने वाले छात्रों को निकाल नहीं सकते।
न्यूज एजेंसी PTI ने शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से कहा, "क्योंकि स्कूली शिक्षा राज्य का विषय है, इसलिए राज्य अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। पहले से ही, 16 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों ने कक्षा 5 और 8 के लिए 'नो-डिटेंशन पॉलिसी' का विकल्प चुना है।"
तो चलिए जानते हैं आखिर ये नो डिटेंशन पॉलसी क्या है और इसके हटने से अब आपके बच्चों पर क्या कुछ असर पड़ सकता है। साथ ही जानते हैं इससे जुड़े कई बड़े सवालों के जवाब भी...
'नो-डिटेंशन' पॉलिसी क्या है?
'नो-डिटेंशन' पॉलसी शिक्षा का अधिकार कानून 2009 (RTE) का एक हिस्सा है, जिसमें कक्षा 1 से 8 तक के छात्रों को फेल नहीं किया जा सकता था। मतलब ये कि किसी भी छात्र को तब तक फेल या स्कूल से निकाला नहीं जा सकता, जब तक वह क्लास 1 से 8 तक की प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं कर लेता। ऐसे में कोई छात्र अगर एग्जाम में फेल भी हो जाता है, तो भी उसे अगली क्लास में प्रमोट किया जा सकता है।
क्यों लाई गई थी 'नो-डिटेंशन' पॉलिसी?
साल 2010-11 में 'नो डिटेंशन' पॉलिसी इसलिए लाई गई थी, क्योंकि एग्जाम में अक्सर खराब स्कोर करने वाले छात्रों की मेंटल हेल्थ पर फेल होने का असर पड़ता है। एक बार 'फेल' हो जाने के बाद, वो छात्र या तो उसी क्लास को रिपीट करते था या स्कूल छोड़ देता था। ऐसा माना जाने लगा कि एक ही क्लास को रिपीट करने से छात्र डिमोटिवेट हो जाते हैं। फेल होने वाला छात्र बाकी बच्चों से खुद को काफी पीछे समझते हैं। इसलिए ये फैसला लिया गया कि 8वीं तक की परीक्षा में किसी बच्चे को फेल नहीं किया जाएगा।
आखिर इस पॉलिसी से क्या परेशानी हुई?
जैसे कि हमने पहले बताया कि पॉलिसी बच्चों की मेंटल हेल्थ को ध्यान में रखते हुए लाई गई थी, लेकिन इसका बच्चों के एकेडमिक परफॉर्मेंस पर बहुत बुरा असर पड़ने लगा। बच्चे बिना पढ़े और मेहनत किए ही अगली क्लास में पहुंच जाते थे, जिससे उनके शिक्षा के लेवल में धीरे-धीरे गिरावट दिखने लगी।
उससे भी ज्यादा असर बोर्ड एग्जाम में देखने को मिला, क्योंकि बच्चों में लापरवाही बढ़ गई और उनके मन से फेल होने का डर भी नहीं रहा। ऐसे में जब बेसिक एजुकेशन के दौरान ही बच्चों की मेहनत करने की आदत छूट गई, तो आगे चल कर बोर्ड एग्जाम में भी बच्चों का इसक खामियाजा भुगतना पड़ता था।
कहां से उठी नो डिटेंशन पॉलिसी को खत्म करने की मांग?
इस सब को देखते हुए 2016 में सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन यानी CABE ने ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट मिनिस्ट्री को ‘नो डिटेंशन पॉलिसी' हटाने का सुझाव दिया था। CABE का तर्क था कि नो डिटेंशन पॉलिसी से छात्रों के सीखने और समझने का स्तर गिरता ही जा रहा है।
कैसे शुरू हुई नो डिटेंशन पॉलिसी को खत्म करने की कवायद?
CABE की इसी सिफारिश को ध्यान में रखते हुए जुलाई 2018 में लोकसभा में राइट टु एजुकेशन में संशोधन करने के लिए एक बिल पेश किया गया और इसी में नो डिटेंशन पॉलिसी को खत्म करने की बात कही गई। इसके अगले ही साल 2019 में ये बिल राज्यसभा से भी पास हो गया और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन गया।
हालांकि, इसमें राज्यों को ये छूट दी गई कि वो ये फैसला खुद ही लें कि उन्हें नो डिटेंशन पॉलिसी लागू रखनी है या नहीं। फिलहाल 16 राज्यों में नो डिटेंशन पॉलिसी लागू है। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मणिपुर, मिजोरम, ओडिशा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप, चंडीगढ़, लद्दाख और लक्षद्वीप ये वो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं, जिन्होंने 5वीं से 8वीं क्लास तक नो डिटेंशन पॉलिसी को लागू रखने का फैसला किया था।
अब क्या होंगे नए बदलाव?
नो डिटेंशन पॉलिसी खत्म होने के बाद, जो छात्र 5वीं और 8वीं तक फेल हो जाएंगे, उनके लिए स्कूलों को दो महीने के भीतर दोबारा परीक्षा करानी होगी। ऐसा इसलिए ताकि उस दो महीने के समय में छात्र उस विषय की अच्छी से तैयारी कर लें और पास हो जाएं।
वहीं अगर दूसरी बार की परीक्षा में भी छात्र फिर से फेल हो जाता है, तो उसे अगली क्लास में नहीं भेजा जाएगा और उसे वही क्लास रिपीट करनी होगी।
ऐसे में क्लास टीचर छात्र और उनके माता-पिता को गाइडेंस देंगे और बच्चे की सीखने और समझने की कमियों को दूर करने के लिए कोई खास प्लान तैयार करेंगे। इतना ही नहीं खुद स्कूल प्रिंसिपल फेल हुए छात्रों की एक लिस्ट बनाएंगे और उनकी प्रोग्रेस की मॉनिटरिंग करेंगे। ऐसे छात्रों का रि-एग्जाम उनकी सीखने और सीखने की क्षमता पर निर्भर करेगा। छात्र जब तक अपनी बेसिक एजुकेशन पूरी नहीं कर लेता, तब तक उसे स्कूल से नहीं निकाला जा सकता।
नो डिटेंशन पॉलिसी को खत्म करने का एक बड़ा मकसद छात्रों के एकेडमिक परफॉर्मेंस में सुधार लाना है। इसके साथ ही इससे छात्रों की सीखने की क्षमता में भी विकास होगा।