CBI अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक, बिहार (Bihar) में नौकरी के बदले जमीन का घोटाला (land-for-jobs scam) 100 करोड़ रुपए का हो सकता है। एजेंसी ने अपनी चल रही जांच में इस साल मई से अगस्त तक की गई छापेमारी के दौरान करीब 250 लैंड डीड और बेहिसाब कैश बरामद किया है। ये लैंड डीड कथित तौर पर नौकरी चाहने वाले लोगों के थे। जिन्होंने लालू प्रसाद यादव के परिवार या उनके सहयोगियों को कथित तौर पर रेलवे में नौकरी पाने के लिए अपनी जमीन बेची या उपहार में दी थी, जब वह रेल मंत्री थे।
News18 ने जांच से जुड़े एक अधिकारी के हवाले से बताया, “CBI ने 16 लैंड डीड को वैरिफाई किया है। नौकरी के इच्छुक लोगों और FIR में आरोपी के बीच सीधा संबंध पाया है। इस तरह के 250 और डीड जांच के दायरे में हैं।"
एजेंसी ने मामले में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के खिलाफ मामला दर्ज किया है। FIR में आरोप लगाया गया है कि लोगों को ऑप्शन के तौर पर और ग्रुप-D में जमीन के बदले नौकरी दी गई।
सूत्रों ने कहा, "इस घोटाले में नौकरी की चाह रखने वाले ज्यादातर लोग उन जिलों से थे, जहां से लालू यादव कभी सांसद रहें हैं, जैसे छपरा, पटना, गोपालगंज, दरभंगा और सीवान। अगर नौकरी चाहने वाला जमीन नहीं दे सकता था, तो हर एक नौकरी बदले 7 लाख रुपए कैश लिया गया था।"
उन्होंने कहा कि अगर कोई परिवार चाहता है कि उसके दो बच्चों को नौकरी मिले, तो उनसे दो जमीन के पार्सल या 14 लाख रुपए की मांग की गई।
'कॉरपोरेट सेटअप की तरह चला भ्रष्टाचार रैकेट'
सीबीआई ने अपनी जांच में पाया है कि पूरा रैकेट एक पेशेवर कॉर्पोरेट सेटअप की तरह चलाया गया था। अधिकारियों ने कहा कि कॉल सेंटर जैसे सेटअप वाले ट्रेंड व्यक्ति इस मकसद के लिए बनाए गए स्पेशल सेल को चलाते थे।
एक अधिकारी ने कहा, "तत्कालीन रेल मंत्री के घर पर एक स्पेशल सेल बनाया गया था, जिसे ट्रेनिंग लिए हुए कर्मियों की तरफ से चलाया जाता था, जो टर्नकी प्रोजेक्ट की तरह रैकेट चलाते थे।"
उन्होंने कहा कि इनके काम करने का तरीका कुछ ऐसा था कि रिश्वत मिलने के बाद उम्मीदवार को जरूरी शैक्षणिक योग्यता, इंटरव्यू ट्रेनिंग और दूसरी सभी जरूरी मदद दिलाई जाती थी।
जांचकर्ताओं को तलाशी के दौरान फर्जी स्कूल सर्टिफिकेट मिले हैं। अधिकारियों ने कहा कि जहां कुछ स्कूल छात्रों के लिए फर्जी कक्षा 10 या कक्षा 12 के सर्टिफिकेट दिए गए थे, तो वहीं कुछ दूसरे स्कूलों ने कहा है कि वे इस बात से अनजान थे कि उनके नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है।
अधिकारियों ने कहा कि 2004 और 2009 के बीच, पटना और उसके आसपास के कई प्लॉट यादव परिवार या उनके सहयोगियों को कम कीमत पर बेचे गए। कुछ मामलों में एजेंसी को डायरेक्ट सबूत मिले हैं, जहां यादव परिवार को जमीन ट्रांसफर की गई थी। कुछ दूसरे मामलों में उनके करीबी सहयोगियों के नाम सामने आए हैं।
एक सूत्र ने कहा, "घोटाले से जुड़े लोगों के नाम पर जमीन हासिल करने का तरीका था। जमीन बाद में FIR में नामजद लोगों को ट्रांसफर कर दी गई। उदाहरण के लिए, 2014 के आखिर में आरोपी के एक सहयोगी को नौकरी बेची गई। नौकरी के पाने वाले व्यक्ति की जमीन FIR में नाम वाले संदिग्ध को ट्रांसफर कर दी गई थी।"