Gyanvapi Masjid Case: ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर सर्वे पर कोर्ट का फैसला आज, पहले जानें कब और कैसे शुरू हुआ विवाद, अब क्या उठी मांग
Gyanvapi Masjid Case: वाराणसी की एक अदालत वीडियो सर्वे से जुड़े एक मामले में अपना फैसला सुनाएगी। उससे पहले जानिए आखिर ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास क्या है और वर्तमान इसे लेकर क्या मांग की गई है
ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर सर्वे पर कोर्ट का फैसला आज (FILE PHOTO)
Gyanvapi Masjid Case: काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath temple) से सटी ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi mosque) के मामले में वाराणसी की एक अदालत आज अपना फैसला सुनाएगी। ये फैसला वीडियो सर्वे (Video Survey) से जुड़े एक मामले में आएगा। अदालत ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति (अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद) की एक याचिका पर भी फैसला करेगी। इसमें सर्वे के लिए नियुक्त किए गए, कोर्ट कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा को हटाने की मांग की गई थी।
दरअसल अदालत से मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर स्थित कुछ देवताओं की मूर्तियों के रोजाना पूजा करने की मांग की गई थी। पांच महिलाओं की तरफ से दायर इस याचिका पर कोर्ट ने पहले वीडियो सर्वे कराने का आदेश दिया था।
अदालत ने मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर स्थित कुछ देवताओं की मूर्तियों की दैनिक पूजा करने के लिए अदालत की अनुमति की मांग करने वाली पांच महिलाओं की याचिका पर पहले सर्वेक्षण का आदेश दिया था। इसके लिए कोर्ट ने अजय कुमार मिश्रा को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया था।
इसके बाद मस्जिद की मैनेजमेंट समिति ने भी अदालत का रुख किया और अजय कुमार मिश्रा की जगह किसी और को कोर्ट कमिश्नर बनाने की अपील की। इसने मिश्रा पर अदालत की तरफ से सौंपे गए इस अनिवार्य काम में हिंदू याचिकाकर्ताओं का पक्ष लेने का आरोप लगाया।
मिश्रा और हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील शनिवार को ज्ञानवापी-शृंगार गौरी मंदिर परिसर के अंदर गए थे। करीब दो घंटे तक परिसर के अंदर इंतजार करने के बावजूद वे काम पूरा नहीं कर पाए और उन्हें परिसर से बाहर आना पड़ा।
पांच महिला याचिकाकर्ताओं के वकील विष्णु जैन भी शनिवार को मिश्रा के साथ परिसर के अंदर गए थे। वहां से निकलने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा था कि मस्जिद के अंदर मौजूद लोगों ने सर्वे टीम को सर्वे करने के लिए मस्जिद क्षेत्र में घुसने नहीं दिया। उन्होंने जिला प्रशासन पर कोर्ट कमिश्नर की टीम को मस्जिद में घुसने में मदद नहीं करने का भी आरोप लगाया था।
कब और कैसे शुरू हुआ पूरा मामला-
वाराणसी में काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी परिसर में मां श्रृंगार गौरी स्थल का संवेदनशील वीडियो-ग्राफिक सर्वे और निरीक्षण 6 और 7 मई को किया जाना था, लेकिन मुसलमानों के विरोध के कारण पूरा नहीं किया जा सका।
यह मुद्दे पहली बार 1991 में खबरों आया था, जब वाराणसी की अदालत में कई याचिकाएं आईं। स्थानीय पुजारियों ने ज्ञानवापी मस्जिद क्षेत्र में पूजा की अनुमति के लिए याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण मुगल राजा औरंगजेब के आदेश पर 17वीं शताब्दी में कराया गया था। ये मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर के एक हिस्से को तोड़कर बनाई गई थी।
इन याचिकाकर्ताओं में से एक वाराणसी के एक वकील विजय शंकर रस्तोगी थे। उन्होंने निचली अदालत में काशी विश्वनाथ मंदिर के पीठासीन देवता के "नेक्स्ट फ्रेंड" के रूप में याचिका दायर की थी। कानूनी भाषा में, "नेक्स्ट फ्रेंड" वह होता है, जो किसी ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो अदालत में खुद का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है।
याचिका 1991 में पेश की गई थी। रस्तोगी ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि महाराजा विक्रमादित्य ने मंदिर का निर्माण किया था, जहां वर्तमान मस्जिद लगभग 2,050 साल पहले से है। उन्होंने आग्रह किया कि ज्ञानवापी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया जाए और हिंदुओं को पूरी जमीन का स्वामित्व दिया जाए। साथ ही मस्जिद के अंदर पूजा करने का अधिकार भी मिले।
इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि क्योंकि ज्ञानवापी मस्जिद को आंशिक रूप से तोड़े गए मंदिर पर बनाया गया था, पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 लागू नहीं हुआ।
1997 में कार्यवाही के बाद, वाराणसी में एक ट्रायल कोर्ट ने फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ताओं का निवारण पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत नहीं हो सकता। उसके बाद, जागरण जोश की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुनरीक्षण याचिकाएं वाराणसी की निचली अदालत में दायर की गईं। उन सब को एक साथ जोड़कर सुना गया।
AIM समिति ने 1998 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें दावा किया गया कि मामला एक दीवानी अदालत से हल नहीं किया जा सकता है। इसमें पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 4 का हवाला दिया गया था। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट की कार्यवाही पर स्टे ऑर्डर जारी किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2019 में काशी विश्वनाथ मंदिर गलियारे की आधारशिला रखी थी। एक ठेकेदार ने अक्टूबर 2019 में कॉरिडोर निर्माण के हिस्से के रूप में ज्ञानवापी मस्जिद के गेट नंबर 4 के पास चबूतरे को तोड़ दिया, जिससे वहां सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय मुसलमानों के विरोध के बाद ठेकेदार ने रातों-रात जर्जर इमारत का निर्माण कर दिया।
बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक महीने बाद दिसंबर 2019 में ज्ञानवापी मस्जिद के आर्केलॉजिकल सर्वे की मांग उठी। वकील विजय शंकर रस्तोगी ने स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की ओर से एक नई याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि 1998 में, साइट के धार्मिक चरित्र को निर्धारित करने के लिए पूरे ज्ञानवापी परिसर से साक्ष्य इकट्ठा करने का आदेश दिया गया था, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को स्थगित कर दिया था।
वर्तमान कैसे उठा ज्ञानवापी का मुद्दा?
मौजूदा मामले में दिल्ली की राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक ने 18 अप्रैल 2021 को याचिका दायर की। इसमें उन्होंने रोजाना श्रृंगार गौरी, भगवान गणेश, भगवान हनुमान और नंदी की पूजा और अनुष्ठान करने की अनुमति मांगी। साथ ही विरोधियों को मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने से रोकने की भी मांग की गई।
अति संवेदनशील ज्ञानवापी मस्जिद की बाहरी दीवार के भीतर देवी श्रृंगार गौरी की तस्वीर है। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मस्जिद की सुरक्षा कड़ी कर दी गई थी। इसके बाद से भक्तों के आने पर भी रोक लगा दी गई थी। केवल चैत्र नवरात्र के चौथे दिन ही यहां पूजा करने की अनुमति थी।
श्रृंगार गौरी पूजा मामले में वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने 26 अप्रैल 2022 को काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद परिसर और अन्य में श्रृंगार गौरी मंदिर के एडवोकेट कमिश्नर की तरफ से वीडियोग्राफी का आदेश दिया था।
कोर्ट ने कहा था कि एडवोकेट कमिश्नर और पक्षकारों के अलावा एक सहयोगी कार्यवाही के दौरान मौजूद रह सकता है।