सुरेंद्र किशोर

सुरेंद्र किशोर
साठ के दशक के रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन जहां समाजवादी आदर्शों के लिए जाने जाते थे तो वहीं वित मंत्री मोरारजी देसाई समाजवाद विरोधी रुझान के माने जाते थे। प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को पार्टी के अंदर दोनों तरह नेताओं के साथ रहना था। तब कांग्रेस की बनावट कुछ इसी तरह की थी। सन 1962 के चीन-भारत युद्ध के बाद जहां कृष्ण मेनन मंत्री पद से हटा दिए गए तो सन 1963 के कामराज योजना के तहत मोरारजी देसाई का मंत्री पद से पत्ता काट दिया गया। बाद के वर्षों में मोरारजी देसाई केंद्र में उप प्रधान मंत्री जरूर बने।
किंतु कृष्ण मेनन को तो सन 1967 में कांग्रेस पार्टी ने लोक सभा का टिकट तक नहीं दिया। जबकि तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी उन्हें टिकट देना चाहती थी। दरअसल इंदिरा जी का तब तक पार्टी पर एकाधिकार कायम नहीं हुआ था। वैसे बाद वर्षों में यानी 1971 के बाद तो पार्टी और सरकार दोनों पर इंदिरा गांधी का एकाधिकार हो गया। पर कांग्रेस में देसाई-मेनन जैसे दो मजबूत ध्रुव बाद में कभी नहीं बने।
व्यक्तिगत आदतों में भी मेनन व देसाई एक दूसरे से काफी अलग थे। यह मात्र संयोग था कि दोनों का जन्म एक ही साल यानी सन 1896 में हुआ था। मोरारजी रणछोड़जी देसाई,वी.के. कृष्ण मेनन से उम्र में करीब दो माह बडे़ थे। पर मोरारजी, मेनन की अपेक्षा 21 साल अधिक जिए। उसका ठोस कारण था।
मेनन खानपान के मामले में जितने लापारवाह थे,मोरारजी उतने ही संयमी।
मोरारजी देसाई के भोजन का समय व प्रकार तय था। उससे वे कभी भी हटते नहीं थे। मेनन खूब चाय पीते थे जबकि मोरारजी कभी चाय नहीं पीते थे। रक्षा मंत्री के रूप में वी.के.कृष्ण मेनन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की इस राय से सहमत थे कि चीन भारत पर आक्रमण नहीं कर सकता। यह अकारण नहीं था कि मेनन इस देश के कम्युनिस्टों के हीरो थे। सन 1967 में तत्कालीन प्रधान मंत्री चाहती थीं कि मेनन को बंबई से लोक सभा का टिकट मिले जहां से वे सन 1962 में विजयी हुए थे। किंतु पार्टी ने मेनन को टिकट नहीं दिया।
1962 में उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने फोन करके फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार को प्रचार में लगाया था। बाद में मेनन कम्युनिस्टों के समर्थन से पश्चिम बंगाल से चुनाव जीतकर लोक सभा में पहुंचे। युद्ध के बारे में मोरारजी देसाई का विचार गांधी जी से मिलता -जुलता था।वे भी शांति-अहिंसा के पक्षधर थे। हालांकि रक्षा मंत्री के रूप में मेनन की राय थी कि भारत को पाकिस्तान से जरूर खतरा है।
चीन ने जब हमारी सीमाओं का अतिक्रमण शुरू किया तो रक्षा मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से कुछ पैसे मांगे ताकि सेना को सुसज्जित किया जा सके। पर वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने रक्षा मंत्रालय की मांग को ठुकरा दिया। दरअसल इसके पीछे नेहरू की नीति काम कर रही थी? सुरक्षा तैयारी को लेकर मोरारजी देसाई बनाम कृष्ण मेनन टकराव और नेहरू की उदासीनता के कारण देश का नुकसान तो हो ही गया।
चीन के हाथों भारत की पराजय के कारण इस देश में पस्तहिम्मती आई। हालांकि तीन ही साल बाद सन 1965 में भारत -पाक युद्ध में भारत की विजय के कारण देश का हौसला बढ़ा। 1971 में बांग्ला देश युद्ध के बाद तो हौसला आसमान पर पहुंच गया था। खैर चीन से पराजय के बाद रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन के इस्तीफे की मांग देश भर में तेज हो गई। इसके बावजूद प्रधान मंत्री नेहरू उनके इस्तीफे के पक्ष में नहीं थे। इसके बाद राष्ट्रपति डा.एस.राधाकृष्णन ने जवाहरलाल नेहरू को अपने पास बुलाया और उनसे कहा कि मेनन से इस्तीफा मांग लें। उसके बाद ही नेहरू ने मेनन से इस्तीफा लिया।
उससे पहले जीप खरीद कांड को लेकर भी मेनन की फजीहत हो चुकी थी। इसलिए भी मेनन से इस्तीफा लेना जरूरी हो गया था। उधर इसके विपरीत मोरारजी देसाई का राजनीति में कद बढ़ता चला गया। इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में उप प्रधान मंत्री बने।उस पद पर कांग्रेस के विभाजन तक रहे।सन 1969 में कांग्रेस का महा विभाजन हुआ था। इंदिरा गांधी की कांग्रेस (R) बनी और मोरारजी देसाई संगठन कांग्रेस में रहे।
1971 के लोक सभा चुनाव में यह तय हो गया कि असली कांग्रेस इंदिरा गांधी के नेतृतव वाली कांग्रेस ही है। 1975 में देश में आपातकाल लगा। मोरारजी देसाई लगातार 19 महीने जेल में रहे। सन 1977 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार गई। जनता पार्टी को बहुमत मिला। सवाल उठा कि प्रधान मंत्री का पद किसे मिलेगा? मोरारजी देसाई,चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच चयन करना था।
जयप्रकाश नारायण और जे.बी.कृपलानी ने सांसदों से बात करने के बाद मोरारजी देसाई के नाम को आगे किया।देसाई प्रधान मंत्री बने। मेनन के विपरीत देसाई हर क्षेत्र में अनुशासन के पक्षधर थे। देसाई चाहते थे संसद में भी अनुशासन रहे। यहां तक कि वे प्रतिपक्ष से भी उम्मीद करते थे कि वे अपनी ताकत जनता में बढ़ाए। संसद के प्रश्न काल को मोरारजी देसाई बहुत महत्व देते थे।
एक बार मोरारजी ने कहा था कि "प्रश्नों के घंटों को मैं सबसे अधिक महत्व देता हूं। इसमें शासन संसबंधी सभी तरह की सूचनाएं सामने आती हैं।" कृष्ण मेनन मोरारजी देसाई से अधिक प्रतिभाशाली थे।किंतु उनके जीवन में न तो अनुशासन था और न ही इस देश की मिट्टी, राजनीति और समाज की समझ। इसीलिए कछुआ जीत गया और खड़हा पीछे रह गया।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
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