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साठ के दशक में कांग्रेस की वैचारिक राजनीति के दो परस्पर विरोधी दिग्गज थे मोरारजी और कृष्ण मेनन

साठ के दशक में कांग्रेस की वैचारिक राजनीति के दो परस्पर विरोधी दिग्गज मोरारजी देसाई और कृष्ण मेनन जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व के नीचे फलते- फूलते रहे थे

Surendra Kishoreअपडेटेड Jan 24, 2022 पर 7:34 AM
साठ के दशक में कांग्रेस की वैचारिक राजनीति के दो परस्पर विरोधी दिग्गज थे मोरारजी और कृष्ण मेनन
सन 1962 के चीन -भारत युद्ध के बाद जहां कृष्ण मेनन मंत्री पद से हटा दिए गए तो सन 1963 के कामराज योजना के तहत मोरारजी देसाई का मंत्री पद से पत्ता काट दिया गया

सुरेंद्र किशोर

साठ के दशक के रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन जहां समाजवादी आदर्शों के लिए जाने जाते थे तो वहीं वित मंत्री मोरारजी देसाई समाजवाद विरोधी रुझान के माने जाते थे। प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को पार्टी के अंदर दोनों तरह नेताओं के साथ रहना था। तब कांग्रेस की बनावट कुछ इसी तरह की थी। सन 1962 के चीन-भारत युद्ध के बाद जहां कृष्ण मेनन मंत्री पद से हटा दिए गए तो सन 1963 के कामराज योजना के तहत मोरारजी देसाई का मंत्री पद से पत्ता काट दिया गया। बाद के वर्षों में मोरारजी देसाई केंद्र में उप प्रधान मंत्री जरूर बने।

किंतु कृष्ण मेनन को तो सन 1967 में कांग्रेस पार्टी ने लोक सभा का टिकट तक नहीं दिया। जबकि तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी उन्हें टिकट देना चाहती थी। दरअसल इंदिरा जी का तब तक पार्टी पर एकाधिकार कायम नहीं हुआ था। वैसे बाद वर्षों में यानी 1971 के बाद तो पार्टी और सरकार दोनों पर इंदिरा गांधी का एकाधिकार हो गया। पर कांग्रेस में देसाई-मेनन जैसे दो मजबूत ध्रुव  बाद में कभी नहीं बने।

व्यक्तिगत आदतों में भी मेनन व देसाई एक दूसरे से काफी अलग थे। यह मात्र संयोग था कि दोनों का जन्म एक ही साल यानी सन 1896 में हुआ था। मोरारजी रणछोड़जी देसाई,वी.के. कृष्ण मेनन से उम्र में करीब दो माह बडे़ थे। पर मोरारजी, मेनन की अपेक्षा 21 साल अधिक जिए। उसका ठोस कारण था।

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