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नितिन गडकरी ने कहा - लोकतंत्र में शासक को असहमति झेलनी पड़ती है, आखिर गडकरी ने किसे दे दी सलाह?

Nitin Gadkari: केंद्रीय मंत्री गडकरी ने कहा कि लेखकों, विचारकों और कवियों को खुलकर और निडर होकर अपनी बात रखनी चाहिए। उनसे ऐसी ही उम्मीद की जाती है। लोकतंत्र की अगर कोई अंतिम कसौटी है तो वह यही है कि शासक को अपने खिलाफ हुई बातों को भी सुनना पड़ता है। महाराष्ट्र के पुणे में आयोजित एक समारोह में उन्होंने इन बातों का जिक्र किया है

MoneyControl Newsअपडेटेड Sep 21, 2024 पर 10:25 AM
नितिन गडकरी ने कहा - लोकतंत्र में शासक को असहमति झेलनी पड़ती है, आखिर गडकरी ने किसे दे दी सलाह?
Nitin Gadkari: केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि शासक अपनी खिलाफ व्यक्त की गई मजबूत राय को बर्दाश्त करे और आत्मचिंतन करे।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी आमतौर पर अपनी बयानबाजी से सुर्खियों में बने रहते हैं। इस बीच महाराष्ट्र के पुणे में MIT वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी में एक पुस्तक विमोचल के दौरान एक ऐसा बयान दिया है। जिससे सियासी गलियारे में हलचल तेज हो गई है। उन्होंने कहा कि हमारे लोकतंत्र की असली परीक्षा यह है कि सत्ता में बैठा व्यक्ति अपने खिलाफ सबसे मजबूत राय को भी बर्दाश्त करे और विरोध है तो आत्ममंथन करें। गडकरी ने आगे कहा कि विचारकों, दार्शनिकों और लेखकों से बिना किसी डर के अपनी राय रखना चाहिए। उनसे यही उम्मीद की जाती है।

बीजेपी नेता ने आगे कहा कि लोकतंत्र की अगर कोई अंतिम कसौटी है तो वह यही है कि आप शासक के सामने चाहे कितनी भी दृढ़ता से अपनी बात रखें। शासक को उसे सहन करना ही होगा। उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग राय रखने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन यहां राय की कमी की समस्या है।

छुआछूत पर जताई नाराजगी

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री ने कहा कि हम न तो दक्षिणपंथी हैं और न ही वामपंथी। हम सिर्फ अवसरवादी हैं। जब तक देश में छुआछूत और श्रेष्ठता की धारणा बनी रहेगी। तब तक राष्ट्र निर्माण का कार्य पूरा नहीं हो सकता है। अगर विचारकों, दार्शनिकों और लेखकों को लगता है कि उनके विचार देश और समाज के हित में हैं, तो उन्हें अपनी राय जरूर रखनी चाहिए। नितिन गडकरी ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि संविधान सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। उन्होंने यह भी कहा, 'हमें लोकतंत्र की जननी कहा जाता है, जो विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया के चार स्तंभों पर खड़ा है। हमारा संविधान सभी के अधिकारों और जिम्मेदारियों को परिभाषित करता है।

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