सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने बुधवार 23 अक्टूबर को कहा कि राज्य सरकारों के पास इंडस्ट्रियल शराब को रेगुलेट करने और उस पर टैक्स लगाने का अधिकार है। बेंच ने 8:1 के बहुमत से राज्य सरकारों के पक्ष में फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने अपने और सात अन्य जजों की ओर से यह फैसला लिखा। चीफ जस्टिस ने कहा कि केंद्र सरकार के पास इंडस्ट्रियल शराब पर नियंत्रण का अधिकार नहीं है। हालांकि, बेंच में अकेले जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इस फैसले के खिलाफ असहमति जताई।
फैसले के दौरान एक हल्के मूड में, जस्टिस रॉय ने मुस्कराते हुए कहा कि चूंकि यह मामला शराब से जुड़ा है, इसलिए जीतने वाले पक्ष के लिए अब "हैप्पी आवर" शुरू हो गया है, लेकिन उन्हें कंट्रोल नहीं खोना चाहिए। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने जवाब दिया कि शराब दोनों पक्षों के लिए रामबाण है– जीतने और हारने वाले दोनों के लिए।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की पहले की 7 जजों की बेंच के फैसले को उलटता है, जिसमें कहा गया था कि इंडस्ट्रियल शराब के उत्पादन पर नियंत्रण का अधिकार केंद्र सरकार को है। यह मामला 2010 में नौ जजों की बेंच को सौंपा गया था।
यह मामला 1999 में शुरू हुआ जब उत्तर प्रदेश सरकार ने होलसेल वेंडर्स की ओर से बेची जाने वाली इंडस्ट्रियल शराब पर 50% एड वेलोरेम फीस लगाने का फैसला किया। इस टैक्स को यह कहकर चुनौती दी गई थी कि राज्य सरकार के पास औद्योगिक शराब पर टैक्स लगाने और नियंत्रित करने का अधिकार नहीं है।
वैसे तो यह मामला 1999 का है लेकिन यह एक दुर्लभ स्थिति थी, जब योगी आदित्यनाथ की अगुआई वाली यूपी सरकार ने नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार के खिलाफ दलीलें दी। राज्य सरकार ने तर्क दिया कि जीएसटी के बाद, औद्योगिक शराब पर टैक्स लगाना राज्यों के लिए आय का एक प्रमुख जरिया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र के इस दावे के खिलाफ तर्क दिया कि केंद्र को औद्योगिक शराब पर टैक्स लगाने का स्पेशल अधिकार है।
वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि वह केंद्र के अधिकारों पर पड़ने वाले नकारात्मक असर पर विचार करें। इस मामले में केरल की सरकार भी यूपी के साथ सह-याचिकाकर्ता थी।
इंडस्ट्रियल शराब का इस्तेमाल नॉन-कंज्यूमेबल इंडस्ट्रियल उत्पादों में सॉल्वेंस के रूप में किया जाता है, जैसे पेंट, कोटिंग्स, दवाइयां, और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में। यह शराब इंसानों के उपभोग के लिए सही नहीं होती है और इसलिए इसे मादक पेय पदार्थ में शामिल नहीं किया जाता।